अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

फैसलो

आजकाल देखण नै मिलै
एक अणदेखी बात
पहले जका माणस
कोनी निकळता घर सूं
बङी-बङी वारदातां पर
बै भी आजकाल
बाहर आकर घर सूं
सङकां पर चालै
मोमबत्ती जला’र हाथां में
कामना करे शांति री
हङताल अर धरनै सूं
मांग करै गिरफ्तारी री
तोङफोङ करै।

के होवैलौ फिर
सजा कोनी मिलै
बरस बीतज्यै
कोई छूटज्यै जमानत पर
कोई छूटज्यै बिना सबूत पर
कांटै सूं कांटौ निकळै
लोह नै लोह ही काट सकै
भले ही बणाओ करङा कानून
ना रोक सकै है कानून
अपराधियां री दादागिरी
आं रै सिर पर रेवै
नेतावां रौ वरदहस्त
पार्टीयां नै चंदौ देणै रे वास्ते
जरुरत पङै अपराधियां री
पुलीस री भी जेब भरै
फेर क्यूँ बै कार्यवाई करै।

मिटाणौ है अगर
अपराधियां रौ अपराध
बणौ आप ही पुलीस अर
अदालत री किताब
आप ही करौ फैसलौ
आप ही द्‌यौ सजा
मारणो नहीं जान सूं
सुख ना पावै जिनगी में
रोवै याद कर-कर
आपरै करमां नै
सोच ना सकै फेर कद ही
अपराध करणै री
सिर उठाणौ ही पङसी
इब आम जनता नै
फेर ही बात बणसी
फेर ही सही फैसलौ होवैलौ।

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सनातन धर्म के टूटने का कारण

आज तक जिसने भी इतिहास मेँ समाज सुधार का संकल्प लिया है, वे सिर्फ कुछ समाज तक ही अपना प्रभाव फैला सके। कालान्तर में वो नया सभ्य समाज स्थापित मान्यताओं पर चलने वाले समाज से कट गया और एक नया धर्म या सम्प्रदाय अस्तित्व में आया। जिसने समाज को जोङने की बजाय तोङने का काम अधिक किया। हर समाज सुधारक स्थापित मान्यताओं से अलग अपनी मान्यताएँ स्थापित करता है और इन मान्यताओं को मानने वालों के लिए एक अलग नाम रखता है जो आगे चलकर नया सम्प्रदाय या धर्म का रुप धारण कर लेता है और वो अपने प्राचीन पूर्वज समाज और धर्म से अलग हो जाता है।
धर्म का अर्थ है “जो हम अपने रोजमर्रा जीवन में क्रियाकलाप करते हैं और कुछ आदर्श मान्यताओं पर चलते हैं।” धर्म में आदर्श का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। बिना आदर्श के कोई धर्म नहीं होता है। आदर्शों के अनुसार हर कोई नहीं चल पाता, इसलिए वो अपनी सुविधानुसार नया सरल आदर्श गढ लेता है और अपना आदर्श दूसरों पर थोपने का प्रयास करता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वति नें वेदों की और लौटने का आह्वान करके अपनी परिष्कृत मान्यताओं पर चलने वालों को आर्य समाज नाम दिया। जब सभी सनातनी हिन्दू आर्य थे तो नये समाज का नाम फिर से आर्य रखना उनकी भारी भूल थी।
यही बात ब्रह्म समाज और अन्य विश्नोई, शैव, वैष्णव, शाक्त, अन्य सन्त पंथी समाज के लिए है। हर संत सनातन हिन्दू धर्म में पैदा हुआ लेकिन अपना अलग सम्प्रदाय बना लिया। थोङी अलग मान्यताएँ रखी और बन गया नया समाज। इन सबके कारण सनातन धर्म को नुकसान हुआ और इस आपसी फूट का लाभ अन्य चतुर विधर्मवादियों को मिला।

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