अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

जस्ट लाइक दैट Just Like That

जस्ट लाइक दैट
लेखक – मिथिलेश गुप्ता

प्रकाशक – सूरज पॉकेट बुक्स

तीन इश्क वाली कहानियों में सिमटी किताब नये नवेले युवा लेखक मिथिलेश गुप्ता की लेखनी से निकली है जिसमें इश्क के अच्छे और बुरे परिणाम दोनों का ही समावेश है. हालांकि इसमें नये लेखक की छाप बखूबी झलकती है खासकर तीसरी कहानी लाइफटाइम वाला लव में, पर कुल मिलाकर संदेश के लिहाज से सभी तीनों कहानियां बढिया है.

नुक्कड़वाला लव में छिछोरा टाइप कहानी है जो लेखक नें ठीक ठाक लिखी है. लफंगा टाइप कहानी में उसका हश्र भी वही होता है जो एक लफंगे का होता है. एक नहीं मिली तो दूसरी के पीछे और दूसरी नहीं मिली तो तीसरी के पीछे.
कहानी ठीक ठाक लिखी है. डायलॉग्स भी किसी नुक्कड़ वाले लफंगे टाइप है जो कहानी में फिट बैठे हैं.

कॉलेज वाला लव इनकी दूसरी कहानी है. मैं इस कहानी में लेखक को पूरे नंबर देता हूं. सही मायने में मेरा पूरा पैसा वसूल इसी कहानी में हुआ है. यह कहानी हंसाती भी है, रुलाती भी है, गुदगुदाती भी है. दोस्ती, प्यार का अहसास, साजिश, बिछड़न, पर्दाफाश, मिलन, जीवनसंगी तक का सफर सब बहुत मजेदार है. इसका कथानक बाकी की दोनों कहानियों से ज्यादा मजबूत है. डायलॉग डिलीवरी भी बहुत उम्दा तरीके से करी है सब पात्रों नें. इस कहानी के लिए दिल से धन्यवाद मिथिलेश जी.

लाइफटाइम वाला लव तीसरी कहानी है जो एक असफल प्रेमी की कहानी बयां करती है. लेखक नें अपने हिसाब से बहुत इमोशंस क्रियेट किये हैं पर यह कहानी मुझे बहुत बोरिंग लगी. मैं नामक किरदार यानि विक्रम का बार बार एक ही सवाल दोहराना बहुत उबाऊ था. मुझे यह कहानी बिल्कुल अच्छी नहीं लगी… लेखक नें हालांकि बहुत अच्छा प्रयास किया है एक असफल प्रेमी की कहानी बयां करने की.

कुल मिलाकर पूरी किताब पढने लायक है. हो सकता है जो मुझे पसंद नहीं आया वह किसी और को पसंद आ जाए. क्योंकि सबकी अपनी अपनी पसंद होती है.

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी

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जोकर जासूस Joker Jasoos

जोकर जासूस

लेखक – शुभानन्द

प्रकाशक – सूरज पॉकेट बुक्स

शुभानन्द जी का यह पहला उपन्यास है और मैं खुशकिस्मत हूं कि यह मुझे उनकी तरफ से भेंटस्वरूप प्राप्त हुआ. मैंने उनके बाद के राजन इकबाल रीबॉर्न सिरीज, मास्टमाइंड भी पहले ही पढ लिये थे. पर मुझे जोकर जासूस में जितना मजा आया उतना उनमें नहीं. जोकर जैसा कैरेक्टर पूरे उपन्यास में छाया था. शुरू से लेकर अंत तक पूरी कहानी उसी के लिए इर्द गिर्द घूमती है. और वह पात्र कहानी को आगे बढाने में पूरी तरह सफल हुआ है और उपन्यास के नाम को सार्थक किया है.

जावेद अमर जॉन का पदार्पण उपन्यास था यह. हो सकता है लेखक का अपना मत कुछ अलग होगा पर मेरा मत यह है कि इनकी एंट्री बहुत लेट हुई. थोड़ी जल्दी होनी चाहिए थी हाफ से पहले, ऐसा मेरा मानना है.

वैसे तो अमर नें अपनी एंट्री के साथ ही अपने मसखरे चुलबुनेपन से खूब मनोरंजन किया. जॉन नें भी पूरा साथ दिया. आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बना यह उपन्यास कहीं से फूहड़ या जरूरत से ज्यादा खून खराबा नहीं दर्शाता है, जैसा कि शुभानन्द जी नें अपने सम्पादकीय में लिखा था. इतना भी अगर नहीं होगा तो उपन्यास सफल भी नहीं होगा.

मेरी एक सलाह है शुभानन्द जी के लिए कि अपने आगामी जावेद अमर जॉन सिरीज के लिए जोकर नामक कैरेक्टर को अपने जासूसों के मिशन में टांग फंसाने या आंशिक सहायक के तौर पर स्थायी रूप से लिया जाना चाहिए.

यह और भी मजेदार बना देगा इस सिरीज को. मेरी दिली तमन्ना है ये…

आपके अगले उपन्यास के इंतजार में…

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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