अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

वैदिक ग्रन्थों में ‘प्रकाश की गति’ और ‘गुरुत्वाकर्षण’ के प्रमाण

प्रकाश की गति :-
हमारे पूर्वजों को प्रकाश की गति के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी थी । प्रमाण ऋग्वेद के प्रथम मंडल में दो ऋचाएं है-
मनो न योऽध्वन: सद्य एत्येक: सत्रा सूरो वस्व ईशे
अर्थात् मन की तरह शीघ्रगामी जो सूर्य स्वर्गीय पथ पर अकेले जाते हैं। ( 1-71-9) 
“तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिकृदसि सूर्य विश्वमाभासिरोचनम्” अर्थात् हे सूर्य, तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो। ( 1.50.9)
योजनानां सहस्रे द्वे द्वेशते द्वे च योजने।

एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते।।
अर्थात् आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है।
इसमें 1 योजन- 9 मील 160 गज

अर्थात् 1 योजन- 9.11 मील

1 दिन रात में- 810000 अर्ध निमेष

अत: 1 सेकेंड में – 9.41 अर्ध निमेष
इस प्रकार 2202 x 9.11- 20060.22 मील प्रति अर्ध निमेष तथा 20060.22 x 9.41- 188766.67 मील प्रति सेकण्ड। 
आधुनिक विज्ञान को मान्य प्रकाश गति के यह अत्यधिक निकट है।

गुरुत्वाकर्षण:-

“पिताजी, यह पृथ्वी, जिस पर हम निवास करते हैं, किस पर टिकी हुई है”❓
लीलावती ने शताब्दियों पूर्व यह प्रश्न अपने पिता भास्कराचार्य से पूछा था। इसके उत्तर में भास्कराचार्य ने कहा, “बाले लीलावती, कुछ लोग जो यह कहते हैं कि यह पृथ्वी शेषनाग, कछुआ या हाथी या अन्य किसी वस्तु पर आधारित है तो वे गलत कहते हैं। यदि यह मान भी लिया जाए कि यह किसी वस्तु पर टिकी हुई है तो भी प्रश्न बना रहता है कि वह वस्तु किस पर टिकी हुई है और इस प्रकार कारण का कारण और फिर उसका कारण… यह क्रम चलता रहा, तो न्याय शास्त्र में इसे अनवस्था दोष कहते हैं❗
लीलावती ने कहा फिर भी यह प्रश्न बना रहता है पिताजी कि पृथ्वी किस चीज पर टिकी है❓
तब भास्कराचार्य ने कहा, क्यों हम यह नहीं मान सकते कि पृथ्वी किसी भी वस्तु पर आधारित नहीं है। यदि हम यह कहें कि पृथ्वी अपने ही बल से टिकी है और इसे धारणात्मिका शक्ति कह दें तो क्या दोष है❓
इस पर लीलावती ने पूछा यह कैसे संभव है❓
तब भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है।
मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो

विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।
सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश (5)
आगे कहते हैं-
आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं
गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।

आकृष्यते तत्पततीव भाति
समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।
सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश- (6)
अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं❗
आजकल हम कहते हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु उसके 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने यह बता दिया था❗
संकलन:- सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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बस यूं ही

रूठा जो सनम हमसे, मिन्नतें की बार बार! 

माना न फिर भी सनम, 

रोया दिल जार जार!! 

रोया दिल जार जार, हंसाया पर ना हंस सका! 

सनम भी इकबार हमसे, हंसकर न बोल सका!! 

हारकर दिल में गुस्सा आया, जो सनम के सिर पर फूटा! 

फिर झटके से मान गया, सनम था जो रूठा!! 

*सत्य*

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