अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

बिना हेलमेट

ट्रेफिक चालान

ऑफिस जाने के लिए हड़बड़ी में दरवाजे से बाहर निकलते हुए रमेश नें अपनी पत्नी किरण को आवाज देकर कहा,

“अरे किरण, जरा हेलमेट तो ला देना अंदर से। टेबल के नीचे पड़ा है, अभी भूल जाता तो ₹५०० का फटका बैठ जाता।”

किरण भागकर हेलमेट लाकर रमेश को थमाती हुई भुनभुनाती है, ‘बिना हेलमेट सिर फूटने का भय नहीं पर चालान का डर जरूर है।’

रमेश नें किरण की इस भुनभुनाहट पर ध्यान नहीं दिया और किरण से मुस्कुराकर ‘आता हूं’ कहकर ऑफिस के लिए निकल गया।

आज रमेश को ऑफिस आधा घंटा जल्दी बुलाया था बॉस नें। इसलिए वह घर से एक घंटा पहले निकल गया, क्योंकि वह रोज ऑफिस जाते हुए स्वराज पानवाले के पास रुककर एक मस्त सा पान वनवाकर खाता है और फिर ५५५ सिगरेट पीता है।

उसने पानवाले के सामने अपना बजाज डिस्कवर स्टेण्ड पर लगाया, हेलमेट हैंडल पर टांगा और बेंच पर बैठ गया। पानवाले नें रमेश को राम-राम की और उसका मनपसंद पान बनाने में तल्लीन हो गया।
हमारी याददाश्त चाहे कितनी भी कमजोर हो पर इन पनवाड़ियों की याददाश्त बहुत मजबूत होती है। आप इनके पास एक बार जाकर अपनी पसंद का मसाला डलवा लीजिए, और दूसरी बार वो खुद आपकी पसंद का पान तैयार करके दे देगा।

पानवाले नें रमेश को उसका पान तैयार करके दिया और दूसरे ग्राहकों को सलटाने लगा। रमेश पान के स्वाद में मग्न होकर पान चबाने लगा और उस समय उसका ध्यान किसी तीसरी दुनिया में था। पान था ही ऐसा कि हर कोई उसके स्वाद में डूब जाता था।

पान पूरी तरह चबाकर ऊपर से एक ५५५ सिगरेट को जलाकर पूरा धूंआ फेफड़ों में भरकर ही खड़ा हुआ वह। पानवाले को पैसा चुकाकर जब उसने हेलमेट पहनने के लिए हैंडल पर हाथ डाला तो चेहरा सफेद हो गया। हेलमेट को अपनी जगह से गायब पाया। उसने इधर- ऊधर चारों तरफ नजर दौड़ाई पर हेलमेट का कहीं पता न पाया।

‘गाड़ी पौंछने का कपड़ा तो बहुत बार गायब हुआ था लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया पर कोई आज हेलमेट पर हाथ साफ कर गया, ये बहुत गलत किया कमीने नें। किरण नें बहुत बार बोला और फिर कई बार ट्रेफिक वालों नें चालान फाड़ा तब जाकर तो हेलमेट लिया और आज उसे भी कमीना उड़ा ले गया। छोड़ूंगा नहीं उसको अगर कहीं मिल गया तो।’

उसनें पानवाले के पास जाकर हेलमेट को चुराने वाले का सुराग पूछा तो उसने मुंडी हिला दी। वह भी क्या बताता, जबकि उसका पूरा ध्यान ग्राहकों की पसंदानुसार पान बनाने में होता है।

अब क्या किया जाए, गया तो गया। शायद हेलमेट चुराने वाले को उसकी मुझसे ज्यादा जरूरत होगी। रमेश नें ऐसा कहकर मन को तसल्ली दी और डिस्कवर स्टार्ट करके आगे बढ़ गया।
अब समस्या आगे ट्रेफिक वालों की थी। मरने से तो आजकल कोई नहीं डरता इसलिए ट्रेफिक वाले ही डराकर चालान वसूलते हैं। सरकार नें लोगों को डराने की जिम्मेदारी मौत से हटाकर ट्रेफिक वालों को सौंप दी है। ट्रेफिक वाला भी माथा देखकर टीका लगाता है। हेलमेट वाला बगैर लाइसेंस के भी बिंदास होकर सफर कर सकता है पर बिना हेलमेट वाला सब कुछ रहने पर भी चालान भरवाकर ही सफर कर सकता है। अब ये बात अलग है कि वो चालान कागज वाला हो या बिना रसीद वाला ये ट्रेफिक वाले पर डिपेंड करता है।

रमेश नें रस्ते में बहुत नजर दौड़ाई पर कहीं भी हेलमेट बिकते नजर नहीं आए। आज तो चालान देना ही पड़ेगा रमेश बाबू, दूर किसी अजनबी के सिर पर बैठा हेलमेट रमेश की ताजा हालत का मजा लिए जा रहा था।

आगे टोल नाका भी आ गया था जहां हर दिन की तरह आज भी ट्रेफिक पुलीस अपनी दिहाड़ी बनाने के मिशन पर जोर शोर से काम कर रही थी।
जहां वे सरकार के खाते में ५०० डालते तो अपनी जेब में भी ५०० डालते। इसमें हेर-फेर नहीं करते। पांच पुलिसकर्मियों को छकाकर बिना हेलमेट वालों के लिए वहां से बचकर निकलना मुश्किल था। हां कोई कोई ऐसा सुपरमैन जरूर निकलता जो ट्रक के पीछे अपना मोटरसाईकिल छुपाकर रखता और उनके नजर आने से पहले ही टोलनाका पार करते ही उड़न छू हो जाता। पुलिस कर्मी अपने ५०० रुपयों को एक बार तो भागते हुए देखते पर कुछ कर ना पाने के कारण दूसरा मुर्गा हलाल करने में लग जाते।

रमेश नें भी सोचा कि क्यूं ना मैं भी किसी ट्रक के पीछे लग जाऊं और चालान बचा लूं। ऐसा सोचकर वह एक ट्रक के पीछे हो गया और अपने मोटरसाईकिल को पुलिसकर्मियों से भरपूर नजर बचाते हुए चलने लगा। पर इस बार उसकी किस्मत तेज ना निकली और एक पुलिस कर्मी की नजर उस पर पड़ ही गयी। वह तुरन्त मुस्तैद हो गया और ट्रक के आगे निकलने की प्रतीक्षा करने लगा।


ट्रक नें जैसे ही टोल चुकाकर टोल क्रॉस किया तो रमेश नें ट्रक की राईट साईड से अपनी बाइक को निकालकर आगे ले जाने की कोशिश में रेस में डाला ही था कि सामने सफेद वर्दी वाला दिख गया डंडा लहराकर मोटरसाईकिल को रोकने का इशारा करते हुए। अब तो पकड़े गये और चालान भरके ही जाना पड़ेगा। किरण की एक साड़ी कम हो गयी।

“स्साला, समझता है ट्रक के पीछे से निकालेगा और हमें नजर नहीं आएगा। मिस्टर इंडिया समझ रखा है क्या खुद को। चल उधर साहब के पास और मोटरसाईकिल साइड में लगा और लाईसेंस, पीयूसी, आरसी दिखा।” कड़कते हुए उस कान्स्टेबल नें अपना रोब झाड़ा।
रमेश नें मोटरसाईकिल साइड में लगा दिया और अपनी जेब से बटुआ निकालकर उसमें से लाईसेंस, आरसी और पीयूसी निकालकर उसे दे दिये। सब ओके था तो उसने लाईसेंस खुद के पास रखकर बाकी दोनों रमेश को पकड़ा दिये।

“हूँ” पुलीसवाला लम्बी हुंकार भरकर बोला, “हेलमेट कहां है तेरा? पता है ना कि बिना हेलमेट सड़क पर चलना गैरकानूनी है। एक्सीडेंट हो गया तो सर फूटने से कैसे बचाएगा?”
“वो स…र, क्या है कि मैं रस्ते में सिगरेट लेने के लिए एक पानवाले के पास रुका और हेलमेट उतारकर हैंडल पर रख दिया। फिर जब सिगरेट लेकर वापस आया तो हेलमेट था ही नहीं वहां। किसी नें चोरी कर लिया सर। मैं तो हमेशा लेकर चलता हूं घर से हेलमेट।” रमेश नें अपनी दलील देकर पुलीसवाले पर प्रभाव डालना चाहा।
“मुझे तुम्हारी फालतू की कहानी नहीं सुननी। बड़े साहब के पास चल, वही तेरा चालान बनाएंगे।” वह उखड़े से स्वर में बोला। अपने शिकार को वह यूं ही जाने नहीं दे सकता था।
“लाईसेंस क्यूं रख लिया सर?” रमेश नें असमंजस होते हुए पूछा।
“चालान भरने के बाद वापस मिल जाएगा तुम्हें।” उसने सपाट स्वर में कहा और बड़े ऑफिसर के पास जाने लगा।
रमेश नें विनय करते हुए कहा, “सर, हेलमेट ही तो नहीं था। उसका बता दीजिए कितना चालान होगा, बाकि सब कागज तो सही ही हैं ना।”
“सरकार नें २००० फिक्स किया है बिना हेलमेट वालों का।” वह अर्थपूर्ण नेत्रों से भरपूर नजर रमेश पर डालते हुए बोला।
रमेश तो ये सुनकर ही जड़ हो गया। उसने तो सोचा था सौ दो सौ में चालान हो जाएगा पर यहां तो २००० का चालान काट रहे हैं।


वह चिरौरी करते हुए बोला “इतना तो पैसा ही नहीं मेरे पास। क्यों गरीबमारी कर रहे हो सर, मेरा एक तो हेलमेट चोरी हो गया ऊपर से आप २००० का चालान कर दोगे। रस्ते में और भी नहीं मिला मुझे नहीं तो नया ले लेता था पर कोई दुकान ही नहीं दिखी। सर, प्लीज कुछ मेरी तरफ भी तो देखिए।”
पुलीसवाला पसीजता सा बोला,”ठीक है भाई, तुम इतना बोल रहे हो और हेलमेट भी चोरी चला गया तो ५०० दे दो, इधर ही मामला सुलट जाएगा।”
वैसे यही इनकी योजना रहती है। पहले कड़कपना दिखाकर डर बैठाओ और फिर ऊपर की कमाई कर लो।


रमेश जेब में तलाशी करते हुए बोला,”देखता हूं सर, मेरे पास कितना है।”
वह पिछली जेब से १०० का नोट निकालकर और सड़क पर चलते हुए वाहनों के विपरीत मुंह करते हुए बोला “यही निकला है सर।”
पुलीसवाला बोला, “इतने से क्या होगा? हैं,,,,। बड़े साहब को भी देना है और मेरे को भी लेना है और बड़े साहब के पास जो हवलदार है उसे भी देना पड़ेगा। ५०० से कम पर बात नहीं बनेगी।”
रमेश नें हताश होते हुए जेब से १०० का एक और नोट निकालकर २०० रुपये देते हुए बोला, “इससे ज्यादा मेरे पास नहीं है सर। आप चाहें तो ले लो नहीं तो चालान ही काट दो फिर।”


रमेश भी इनकी आदत से वाकिफ था। उसे पता था कि चालान काट दिया तो इनको कुछ नहीं मिलेगा इसलिए ये लेना ही पड़ेगा।
पुलीसवाले नें भी सोचा सौ से दो सौ मिल रहा है ले ही लेता हूं। बड़े साहब को बोल दूंगा १०० ही मिला है। वैसे भी इसका हेलमेट भी चोरी हो गया है तो इसे नया हेलमेट खरीदने के लिए भी तो पैसा रखना पड़ेगा।
उसने वो २०० रुपये अपनी जेब में चुपके से डाले और लाइसेंस वापस कर दिया।


रमेश लाइसेंस वापस पाकर धन्य हुआ और ऑफिस की तरफ मोटरसाईकिल भगा दिया।

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

टिप्पणी करे »

जोकर के आगे दो जोकर – शुभानन्द

जोकर के आगे दो जोकर – शुभानन्द
प्रकाशक – सूरज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ – 202, मूल्य – 200/-
पढ़ा गया – 29-04-2021

# एस. सी. बेदी के लिखे सफलतम जासूसी उपन्यासों के पात्र राजन-इकबाल को फिर से जीवित करके उपन्यास लेखन की शुरुआत करने वाले और जावेद-अमर-जॉन नाम के पात्रों की नयी सफल जोड़ी की स्थापना करने वाले लेखक “अनादि शुभानन्द” अब एक सफल थ्रिलर के लेखक बन चुके हैं।

# हाल ही में मैंने इनका नवीनतम उपन्यास “जोकर के आगे दो जोकर” पढ़ा और यह अंतरर्राष्ट्रीय जासूस जोकर सिरीज का दूसरा उपन्यास है। जोकर अपने आप में एक सस्पेंशियल शख्सियत है। पहले ही उपन्यास में मैं जोकर के कारनामे देखकर दंग रह गया था और तभी मैंने लेखक महोदय को जोकर पर फिर से उपन्यास लिखने को कह दिया था।

# यह उपन्यास मुख्य रूप से जोकर और उसके दो साथियों पर ही पूरी तरह से लिखा हुआ है और अन्य कोई दृश्य नहीं दिखाई देगा आपको इसमें। अबूझमाड़ का जंगल जो छत्तीसगढ़ का प्रमुख नक्शली क्षेत्र है वहां कई साल पहले एक ट्रक पलट गया था जिसमें भूतपूर्व नेता की ब्लैकमनी जो सोने के रूप में है और एक खास सबूत जो उसे फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी दिला सकता है, वैसा ही पड़ा था जिसे निकालने का काम जोकर के जिम्मे आता है।

# अब जोकर उस माल को वहां से कैसे निकालता है और उसमें किस पार्टी को क्या फायदा होता है,
और क्या सच में जोकर नक्शलियों की नाक के नीचे से वो सोना निकाल पाता है या नाकामयाब होता है,
और कहीं सोने की आड़ में कोई तीसरा गेम तो नहीं खेला जा रहा???
इन्हीं सवालों के जवाब लेकर शुभानन्द जी इस बार हाजिर हुए हैं लेकर @जोकर के आगे दो जोकर।

# उपन्यास बहुत ही सरल व सीधी सपाट शैली में लिखा हुआ है चूंकि कथानक पूरी तरह भिन्न था इसलिए जोकर की खासियत थोड़ी कम दिखी पिछले उपन्यास से, पर जोकर नें जो रोल निभाया उससे पूरी तरह सहमत हूं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इस बार उसे विलेन के रूप में हीरो का रोल निभाने को दिया गया था।

रेटिंग 9/10

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

जोकर के आगे दो जोकर
2 टिप्पणियाँ »

%d bloggers like this: