अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

जोकर जासूस Joker Jasoos

जोकर जासूस

लेखक – शुभानन्द

प्रकाशक – सूरज पॉकेट बुक्स

शुभानन्द जी का यह पहला उपन्यास है और मैं खुशकिस्मत हूं कि यह मुझे उनकी तरफ से भेंटस्वरूप प्राप्त हुआ. मैंने उनके बाद के राजन इकबाल रीबॉर्न सिरीज, मास्टमाइंड भी पहले ही पढ लिये थे. पर मुझे जोकर जासूस में जितना मजा आया उतना उनमें नहीं. जोकर जैसा कैरेक्टर पूरे उपन्यास में छाया था. शुरू से लेकर अंत तक पूरी कहानी उसी के लिए इर्द गिर्द घूमती है. और वह पात्र कहानी को आगे बढाने में पूरी तरह सफल हुआ है और उपन्यास के नाम को सार्थक किया है.

जावेद अमर जॉन का पदार्पण उपन्यास था यह. हो सकता है लेखक का अपना मत कुछ अलग होगा पर मेरा मत यह है कि इनकी एंट्री बहुत लेट हुई. थोड़ी जल्दी होनी चाहिए थी हाफ से पहले, ऐसा मेरा मानना है.

वैसे तो अमर नें अपनी एंट्री के साथ ही अपने मसखरे चुलबुनेपन से खूब मनोरंजन किया. जॉन नें भी पूरा साथ दिया. आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बना यह उपन्यास कहीं से फूहड़ या जरूरत से ज्यादा खून खराबा नहीं दर्शाता है, जैसा कि शुभानन्द जी नें अपने सम्पादकीय में लिखा था. इतना भी अगर नहीं होगा तो उपन्यास सफल भी नहीं होगा.

मेरी एक सलाह है शुभानन्द जी के लिए कि अपने आगामी जावेद अमर जॉन सिरीज के लिए जोकर नामक कैरेक्टर को अपने जासूसों के मिशन में टांग फंसाने या आंशिक सहायक के तौर पर स्थायी रूप से लिया जाना चाहिए.

यह और भी मजेदार बना देगा इस सिरीज को. मेरी दिली तमन्ना है ये…

आपके अगले उपन्यास के इंतजार में…

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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एक हसीन कत्ल Ek Haseen Katal

मोहन मौर्य का लिखा यह पहला उपन्यास है. मैंने सोचा नहीं था कि यह इतना अच्छा मनोरंजन कर पाएगा. शुरू में मुझे लगा था कि बस पढकर पूरा करना है, पर जैसे जैसे मैं इसे पढता गया वैसे वैसे कहानी में रस पैदा होने लगा. बाद में तो कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि किसी का यह पहला उपन्यास हो सकता है. मोहन जी की पात्रों के संवादों पर अच्छी पकड़ है.

कहानी के तीनों दोस्त राज, सीमा और रीया अच्छी तरह कहानी को आगे बढा लेते हैं. उच्च सोसायटी की बिगड़ी औलादें जो कुछ न करे वो गनीमत है. वो अपने आगे दूसरों को कुछ नहीं समझते. पर खुद वो कितने हीन कर्म करते हैं वह उनको सभ्य लगता है. पुलीस में भी अच्छे और बुरे सब तरह के लोग होते हैं यह भी बखूबी दिखाया गया और सबसे अच्छी बात कि वो हसीन कत्ल किसने किया यह सस्पेंस अंत तक बरकरार रखा. हलांकि रीया पर मेरा भी शक था पर मुख्य कातिल कोई और होगा यह मैं भी नहीं सोच सका… इस बात पर मैं मोहन जी को बधाई देता हूं. हलांकि एक बात मुझे अखरती है कि मुख्य कातिल नें बड़ी जल्दी गुनाह कबूल कर लिया वो भी इतने बड़े पद पर बैठकर. उससे थोड़ी चालें और चलवानी थी अपनी बेगुनाही के लिए. उसे मालूम था कि चाकू पर उसके फिंगरप्रिंट छप जाएंगे जिस पर उसने एक्सपर्ट होते हुए और इसे हटाने में सक्षम होते हुए भी उसने कुछ नहीं किया. यहां भी लेखक को ध्यान देने की जरूरत थी…
बाकी सब कुल मिलाकर पैसा वसूल उपन्यास है.

सूरज पॉकेट बुक्स का मैं आभार प्रकट करता हूं कि वह नये नये उपन्यासकारों और लेखकों को अपने प्रकाशन में स्थान देकर उनकी रचनाशीलता को बढावा दे रहा है. मोहन जी के लिए शुभकामनाएं कि वे आगे भी उम्दा लेखन करते रहें….

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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