अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

सपना ही तो था वो

सपना ही तो था वो
मेरी आँखों में
बैठा था जिसे संजोए
घर की मुंडेर पर
मैं चुन लिया गया था
नाना प्रतिभागियों में से
सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागी
बन गया था मैं
पटवारी
नहीं हुआ विश्वास
जब देखा अखबार में नंबर
बहुत खुश हुआ मैं
माँ-पापा खुश हुए
कि सार्थक हुआ पढाना
बर्फी बाँटी गयी
आज रंग लायी
मेरी बरसों की मेहनत
काम शुरु किया
कभी इस खेत
तो कभी उस खेत
तहसील का काम
गाँव का काम
देखते ही देखते निकल गये
पटवारी के कई साल
कच्ची मुंडेर की जगह
हो गयी पक्की दीवार
सरकण्डों की छत बन गयी
आरसीसी की छत
दो कमरों की जगह
बन गया दुमंजिला घर
.
मैं गया था एक दिन
एक किसान के घर
जोत का बंटवारा था
जमीन के हिस्से कर दिये
दो बना दिए खेत
एक के टुकङे करके
कुछ देर पहले तक
थी आपसी नाराजगी
अब दोनों सगे भाई
बंटवारे की खुशी जताई
बिटिया को आवाज लगाई
चाय तो पीकर जाना
विनती कर रहे दोनों भाई
मैं बाट जोहने लगा
बिटिया चूल्हे से जूझने लगी
चाय बनकर तैयार हुई
मैं अपने में खोया था
अचानक आवाज आयी
‘मामाजी चाय ले लीजिए’
मैंने देखा चाय की तरफ
फिर चाय लाने वाली की तरफ
नहीं थी वो बिटिया किसान की
वो थी मेरी भानजी
‘आप कहाँ खो गये थे
दीवार पर गढ्ढा कर दिया’
पूछ रही थी मेरी भानजी
क्या जवाब देता मैं
मैं जो देख रहा था
‘सपना ही तो था वो।’
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

टिप्पणी करे »

महापर्व

जब भी आता है
कोई महापर्व
उमंग से भर जाता है मन
पूरे मनोयोग से
शामिल होते हैं पर्व में
बिखर जाते हैं चहुँओर
खुशियों के हजारों पल
भर जाता है पूरा घर
परिवारजनों से
जो रहते थे परदेस
वे भी आते हैं पर्व पर
सम्मिलित होने
परिवार की खुशियों में
पूरे प्रफुल्लित वातावरण में
मनाया जाता है महापर्व
पर्व के थोङे दिनों में ही
खो सा जाता है मन
सब परिवारजनों के बीच

महापर्व के अवसान पर
चले जाते हैं जब
सब परिवारजन
अपने-अपने गंतव्य
डेरा जमा लेती है तब घर में
खामोशी और शांति
छा जाती है तब
बाकी सदस्यों पर
अजीब तरह की खामोशी
जब भी जाता हूँ मैं
अपने घर संध्या को
चुभता है मुझे
अपने घर में पसरा
शमसान सा सन्नाटा
भर जाता है मन
अपनों से मिलने की
असीम उमंगों में
काश! ऐसा होता
हर माह
किसी महापर्व के बहाने
हो सब अपनों से
अपना स्नेह मिलन।
– सतवीर वर्मा `बिरकाळी’

टिप्पणी करे »

%d bloggers like this: