अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

संस्कृत का पिछङापन

कई बार मैं सोचने लगता हूँ कि जब हमारे इतिहास में वेद, पुराण और अन्य संस्कृत ग्रन्थ भरे पङे हैं और हमारे पास संस्कृत जैसी विश्व की सर्वाधिक उपयुक्त और मानक भाषा थी तो इसे आम जन की भाषा क्यों नहीं बनायी गयी?
क्या कारण है कि पूरे भारतवर्ष में संस्कृत ग्रन्थों की भरमार है पर संस्कृत को ब्राह्मणों को छोङकर और कहीं पर जगह नहीं मिली?

सोचने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि ब्राह्मणों नें अपना कद समाज में सबसे ऊपर रखने के लिए संस्कृत को अपने तक ही सीमित रखा और अन्य वर्णों को शिक्षा से वंचित रखा। इसलिए संस्कृत भाषा जनमानस की भाषा न बन सकी। अगर उस समय इस पर ध्यान दिया जाता तो निश्चित रुप से आज विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा संस्कृत होती और सभी शोध कार्य अँग्रेजी की बजाय संस्कृत में होते।

यही बात धर्म पर भी लागू होती है। वेदिककाल में धर्म पर सभी का समान रुप से हक था और किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं था। कालान्तर में ब्रह्म के उपासक खुद को ब्राह्मण कहलाने लगे और अपनी सन्तानों को भी ब्रह्म की शिक्षा दिलाकर पण्डित और ब्राह्मण बनाकर धर्म पर अधिकार करने लगे। सभी धार्मिक कार्यों में इन्हीं पण्डितों और ब्राह्मणों को बुलाना मजबूरी हो गयी, क्योंकि ब्राह्मणोँ की तरह दूसरे वर्ण के लोग भी अपना पैतृक व्यवसाय अपनाने लगे। कुछ नें अपनी रुचि के अनुसार पैतृक व्यवसाय अपनाया और कुछ नें मजबूरी में अपनाया। क्योंकि उनको दूसरा व्यवसाय अपनाने पर पाबंदी भी लगायी जाती थी।
इस तरह से धर्म पर ब्राह्मणों का एकमात्र आधिपत्य हो गया।

क्षत्रिय अपने बराबर किसी को नहीं आने देते थे और जो कोई इसकी कोशिश करता उसे मौत की सजा दे दी जाती थी। अगर कहीं पर क्षत्रिय या ब्राह्मण शिक्षा ले रहे होते थे तो वहाँ शूद्रों के लिए शिक्षा वर्जित थी। इस कारण शूद्र अशिक्षित रहे।

जब शूद्रों को शिक्षा से भी वंचित रखा गया और मन्दिरों में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता था तो ऐसे में उनके पास गौतम बुद्ध द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था। बौद्ध धर्म नें अपनी भाषा जनमानस की पाली भाषा चुनी और वो इतनी लोकप्रिय हुई कि कारवाँ जुङता गया। इसी कारण बौद्ध धर्म शुरुआत में जमकर फैला। शूद्रों को इसमें अपनत्व नजर आया। पूरा बौद्ध साहित्य पाली भाषा में लिखा जाने लगा। इससे प्रेरित होकर कई स्थानीय भाषाकार भी अपनी भाषा में ग्रन्थ रचने लगे। उस समय के जैन ग्रन्थ, नाथ सम्प्रदाय द्वारा रचित ग्रन्थ इसके उदाहरण हैं। पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो इसी श्रेणी के ग्रन्थ हैं।

जब इस्लामी आक्रमणकारी आए तो उन्होंने भारत की सामाजिक तस्वीर देखी और वे पूरी तरह अपनी बादशाहत कायम करने के प्रति आश्वस्त हो गये। वे इतने नासमझ नहीं थे कि यहाँ शूद्रों के प्रति ब्राह्मणों और अन्य उच्च वर्गों का व्यवहार नहीं समझ सकते थे। क्षत्रियों की आपसी एकता के अभाव नें उनको अपने पैर जमाने मेँ सहायता की। जो शूद्र हिन्दू समाज में अछूत समझे जाते थे, उनको इस्लाम नें अपनाया। उनको अरबी संस्कृति से परिचित कराया और उर्दू फारसी भाषा पकङाई। भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा का ये सबसे बङा क्षरण था।
फिर भी ब्राह्मण और क्षत्रिय नहीं चेते और अपनी स्वार्थी और अदूरदर्शी सोच के कारण संस्कृत और आपसी एकता का मूल्य नहीं समझ सके। आपस में लङते रहे और विदेशी आकर इन पर आधिपत्य जमाते गये। मुगलों के समय उत्तर भारत में कई भाषाएँ अस्तित्व में आ चुकी थी। इनमें अवधी, मागधी, ब्रज, मैथीली साहित्य के लिए प्रमुख रुप से प्रयोग की जाने लगी। संस्कृत का मोह बहुत कम हो गया था। संस्कृत में छिटपुट ग्रन्थ ही रचे जाते थे।

फिर अँग्रेज आए तो उन्होंने रही सही संस्कृत को भी चलन से बाहर कर दिया। जैसे जैसे भारत पर अधिकार करते गये वैसे वैसे अपनी अँग्रेजी भारतीयों पर थोपते गये। ऐसे में उत्तर भारत में सभी स्थानीय भाषाओं की एक मिश्रित भाषा हिन्दी नें जन्म लिया। सभी भाषाओं का मिश्रण होने से ये भाषा लोकप्रिय हो गयी और अँग्रेजी और उर्दू से टक्कर लेने लगी। अब तक संस्कृत का बिल्कुल ह्रास हो गया था और हिन्दी भाषा साहित्य में प्रतिस्थापित होने लगी। भारतेन्दू हरिश्चन्द्र, बाबू गुलाबराय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचन्द नें इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया। अब तक हिन्दी सभी की जीह्वा पर चढ चुकी थी। लगभग उत्तर भारत में हिन्दी को मान्यता दी जाने लगी थी और दक्षिणी भारत में भी हिन्दी अपनी पैठ बना रही थी। लेकिन राजकाज की भाषा अँग्रेजी होने के कारण हिन्दी के फैलाव में रुकावट पैदा हो रही थी।

फिर जब आजादी मिली तो सब खुश हुए कि अब स्वराज आ गया है तो अपनी भाषा में सब काम होंगे। पर सर्वोच्च नेता की गुलाम मानसिकता और दक्षिणी भारत के नेताओं के विरोध के कारण हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं मिला। उच्च शिक्षा और न्यायालयों की भाषा अँग्रेजी बना दी और भारतीय भाषाओं को पीछे ढकेल दिया। संस्कृत एक ऐच्छिक विषय होकर रह गया है आज। अँग्रेजी को बहुत जबरदस्त तरीके से हम पर थोपी जा रही है और संस्कृत को बहुत सुनियोजित तरीके से खत्म की जा रही है।

आज जरुरत है भारतीय संस्कृति और संस्कृत को पुनर्स्थापित करने की। उच्च शिक्षा, न्यायालयों और सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा को लागू करने के लिए मजबूती से लङना होगा। आज जब नासा जैसी संस्था संस्कृत की मौलिकता को देखकर इसे अपने कार्यक्रम में शामिल करने जा रही है और जहाँ संस्कृत का जन्म हुआ, वहाँ इसे कोई पूछने वाला भी नहीं है। समय रहते हमें जागना होगा, वरना एक बहुत अच्छी चीज हमारे हाथ से फिसल जाएगी।

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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मैं हूँ हिन्दू राष्ट्रवादी

समझते हैं लोग
हूँ मैं एक साम्प्रदायिक
करता हूँ मैं बातें
सिर्फ हिन्दुत्व की
क्या सिर्फ बात करने से
स्वधर्म की
हो जाता है व्यक्ति
साम्प्रदायिक?
सबको कहता हूँ मैं
हूँ मैं हिन्दू राष्ट्रवादी
क्या सिर्फ इस कारण
बन जाता हूँ मैं
साम्प्रदायिक और
देशद्रोही?
आरोप लगते हैं मुझ पर
नहीं हूँ मैं धर्मनिरपेक्ष
नहीं हो सकता विकास
मेरी हिन्दुवादी सोच से
टूट जाएगा देश
मेरी राष्ट्रवादी सोच से,
नहीं समा सकते
मेरी राष्ट्रवादी सोच में
देश के मताभिन्न समाज
समझाते हैं सब मुझको
कहता रहूँ मैं सबको
नहीं हूँ मैं हिन्दू
बन जाऊं मैं हितरक्षक
दूसरे धर्मों का
कहलाऊं मैं तब धर्मनिरपेक्ष
सिन्दूरी तिलक त्यागकर
पहनूँ टोपी जालीदार
भूलकर अपने हिन्दु धर्म को
बात करुँ मैं अन्य धर्मों की
तब कहलाऊंगा मैं धर्मनिरपेक्ष
तब करेंगे विश्वास
मुझ पर देशवासी,
पूछता हूँ मैं
देश के उन बुद्धिजीवियों से
और
तथाकथित सेकुलरों से
अगर हूँ मैं हिन्दू
को क्या बुराई है
ये कहने में कि
“मैँ हिन्दू हूँ”
और चाहता हूँ मैं अगर
देश की एकता और अखण्डता
तो क्या बुराई है
ये कहने में कि
“मैँ राष्ट्रवादी हूँ।”

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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