अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

लेखन

लेखन हर व्यक्ति करना चाहता है। पर ये हर एक के बस की बात नहीं होती। लेखन में शब्द निर्माण महत्त्वपूर्ण होता है। जिनको शब्द निर्माण की कला आती है वो ही लेखन में सफल हो सकते हैं। जो लेखन नहीं कर सकते लेकिन करना चाहते हैं तो लेखकों के सम्पर्क में रहने से शब्द निर्माण कला में पारंगत हो सकते हैं और फिर वे खुद भी लेखन कर सकते हैं।
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लेखन दो तरह का होता है। एक स्वान्तः सुखाय लेखन और दूसरा व्यावसायिक लेखन। जो व्यक्ति स्वान्तः सुखाय लेखन करते हैं उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि पाठक क्या चाहते हैं या उनकी किस विषय के प्रति ज्यादा रुचि है। ऐसे लेखक मन में उठे विचारों को शब्दों का रुप देकर लिख डालते हैं।
जो लेखक पाठकों की पसन्द को देखकर लेखन करते हैं वो वसायिक लेखन के अन्तर्गत आता है। इस प्रकार के लेखन में पाठकों की रुचि का पूरा ख्याल रखना पङता है। इसमें हम अपनी मर्जी के अनुसार बहुत कम लिख पाते हैं और ना चाहते हुए भी पाठकोँ की मर्जी के अनुसार लिखना पङता है क्योंकि ये उसकी कमाई का जरिया होता है।
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मैं भी लिखता हूँ पर मेरे ख्याल से मैं व्यावसायिक लेखन ना करके स्वान्तः सुखाय लेखन ही करता हूँ। जो कुछ मन में आता है वो लिख डालता हूँ। पाठक तो कुछ भी लिखने की माँग कर सकते हैं। स्वान्तः सुखाय लेखन में मौलिकता ज्यादा रहती है।
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आप अगर लिखते हैं तो आपको ये आशा नहीं करनी चाहिए कि आपके लेख पर बहुत अधिक प्रतिक्रियाएँ आए या आपके लेख को ज्यादा से ज्यादा पढा जाए। हालांकि ऐसा होना भी चाहिए पर इसके लिए आप पाठकों पर दबाव नहीं डाल सकते कि आप मेरे लेख को पढें और मेरे लेख पर अपनी प्रतिक्रियाएं और पसन्दगी दर्ज कीजिए। अगर पाठकों को लगेगा कि ये लेख उनके अनुरुप है तो वे इसे पढेंगे भी और अगर कुछ सुझाव या आपत्तियां होंगी तो वे इसे अपनी प्रतिक्रिया के माध्यम से दर्ज भी करेंगे।
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ये जरुरी नहीं कि जो पाठक आपके लेख को पढते हैं वो आपके लेख पर अपनी प्रतिक्रिया या पसन्दगी दर्ज करे। अगर पसन्दगी या प्रतिक्रिया दर्ज ना करे तो भी आपको ये सन्तोष रखना चाहिए कि पाठक नें आपके लेख को पढा जरुर है।
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दिल्ली का मेरा पहला सफरः 4

सुबह जब नींद खुली तो गाङी पंजाब में थी। बठिण्डा आने वाला था। पंजाब के खेत लहलहा रहे थे। धान की फसल पूरी जवान थी। दूर दूर तक धान की फसल दिख रही थी। गाङी सरपट भागी जा रही थी। खेतों में सरदार लोग काम कर रहे थे। मुझे पंजाब के खेतों के साथ राजस्थान के खेतोँ की तुलना करने में काफी संकोच हुआ।
खैर पंजाब की प्रकृति का आनंन लेते हुए बठिण्डा आ गया। मैं स्टेशन पर पंजाबी संस्कृति में खो गया। मुझे ये भी ख्याल नहीं रहा कि किसी सहयात्री से पूछ लूं कि आप कहाँ जाएंगे या ये ट्रेन कहाँ जा रही है। मैंने बठिण्डा में चाय बिस्किट के साथ हल्का नाश्ता लिया।
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ट्रेन बठिण्डा से रवाना हो गयी। मैं मस्त होकर अपनी सीट पर बैठा था। भीङ बिल्कुल नहीं थी। मेरे साथ दो सरदार और एक व्यक्ति और बैठे थे। सामने की सीट पर दो औरतें और एक आदमी के साथ एक बच्चा भी था। वे सब गंगानगर जा रहे थे, ये मुझे बाद में पता चला। ऊपर की दोनों बर्थ पर सामान लदा था।
मैं अपने में ही मगन था कि तभी काले कोट वाले टोपी धारक की छवी प्रकट हुई। मैंने तब तक टी.टी. भी नहीं देखा हुआ था। जब वो सबकी टिकटें चैक करने लगा तब मुझे पता चला कि टी.टी. ऐसा होता है। मैंने भी अपना टिकट हाथ में ले लिया और टी.टी. को दिखाने के लिए शान से बैठ गया। टी.टी. नें सबकी टिकट चैक करके मेरी टिकट चैक की। टिकट में गंतव्य हनुमानगढ था और गाङी का गंतव्य गंगानगर था।
टीटी नें मुझसे पूछा, “कहाँ जा रहे हो?”
मैंने बता दिया कि “हनुमानगढ जा रहा हूँ।”
“लेकिन ये टिकट तो गंगानगर की है और ट्रेन भी गंगानगर ही जा रही है।”
मैंने बताया कि “हनुमानगढ गंगानगर से आगे ही तो है। मैं गंगानगर स्टेशन पर उतरकर हनुमानगढ चला जाऊंगा।”
टीटी बोला “नहीं बेटा, हनुमानगढ जाने के लिए बठिण्डा से ट्रेन बदलनी पङती है। ये ट्रेन गंगानगर जा रही है और इस रास्ते में हनुमानगढ नहीं आता है।”
अब मेरा मुँह देखने वाला था। पहली बार ट्रेन का अकेला सफर और उस पर ये आफत। तब मुझे अहसास हुआ कि अगर चलने से पहले पूरे रास्ते का नक्शा देख लेता तो कितन अच्छा होता।
अब क्या किया जाए?
टीटी बोला “तुमने गैरकानूनी रुप से सफर किया है। इसलिए दण्ड भरो या जेल जाओ।”
मैंने लगभग रोने वाले अंदाज में कहा “लेकिन अंकल, जब मैंने टिकट खिङकी पर पूछताछ की थी तब तो उस मैडम नें ऐसा कुछ नहीं कहा था कि बठिण्डा ट्रेन बदलकर हनुमानगढ जाया जाएगा। उन्हें बताना चाहिए था ना?”
टीटी बोला “तुम्हें भी पूछना चाहिए था कि ये ट्रेन सीधी हनुमानगढ जाएगी या कहीँ बदलनी पङेगी। अब दण्ड तो भरना ही पङेगा वरना छः माह की जेल के लिए तैयार रहो।”
मैं जेल के नाम से डर गया। मेरे पूरे शैक्षणिक कैरियर का सवाल था। मैं दण्ड भरने पर राजी हो गया। मैंने कुछ रुपये खर्च के लिए ऊपर की जेब में रखे थे और बाकि के बेल्ट की जेब में। मैंने 50 रुपये निकाले और उसे दिये। पर वो नहीं माने। अंत में 100 रुपयों का चमीङ खाकर मामला शान्त हुआ।
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फिर जब गंगानगर स्टेशन पर उतरा तो रेलवे पुलीस द्वारा टिकट चैकिंग हो रही थी। मेरी टिकट देखकर वहाँ भी मुझे धर लिया गया। मैंनें बहुत समझाया कि मैंने इसका दण्ड भर दिया है, पर वो नहीं माने। लगभग 15 मिनट तक मुझे वहीं स्टेशन पर बिठाए रखा। तभी मुझे वो टीटी नजर आया जिन्होंने मेरी टिकट चैक की थी। मैंने उन्हें आवाज लगायी और छोङने के लिए प्रार्थना की। तब जाकर मेरा पिण्ड उनसे छूटा नहीं तो पता नहीं उस दिन क्या होता।
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फिर वहाँ से हनुमानगढ और नोहर के लिए ट्रेन की पूरी पूछताछ करके ट्रेन में चढा। हनुमानगढ उतरकर रोजगार कार्यालय में जाना कैंसिल कर दिया क्योंकि उस दिन दुर्भाग्य से रविवार था। वहाँ से फिर सीधा नोहर आ गया।
उस घटना के बाद जब भी मैं कहीं अनजान जगह जाता तो पहले नक्शा जरुर देख लेता था। आप भी कहीं जाने से पहले ऐसा जरुर करें।
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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