अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

एक रात की सखी

ऊषा की उजली रश्मियों से
सराबोर धूप
पङी जब आँगन के
कोने में उगी घास की
नन्हीं पत्तियों पर,

कुनमुनाकर जम्हाई लेती हुई
नन्हीं ओस की बूँद नें
अपनी आँखों की पलकों को
रश्मियों के सहारे
हौले-हौले उघाङा,

इशारा पाकर
रश्मियों के आगमन का
दुखित हृदय से
तजना पङा
अपनी
निशा की साथिन पत्तियों को,

भर नयनों में अश्रू
गले लगी दोनों
एक रात की सखियाँ,

फिर आने का
करके करार
ओस की बूँद
चल पङी अपने
दिन भर की सैर पर
अपनी हमराही
भास्कर रश्मि के संग।

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थोङा सा भोजन!

एक दिन
मैं जा रहा था
एक शादी के बुलावे पर
बङी शादी थी
चलने को जगह की कमी थी।
एक जगह देखा
शादी का बचा हुआ खाना
फेंका जा रहा था
सङक किनारे
बच गया था बहुत सा खाना
बचे हुए खाने का ढेर लगाकर
चलते बने मजदूर
इतने में देखा
दो बच्चे
जो नजदीक ही
आँखें गङाए थे उनपर
कब वो जाएँ
और कब
हमारा नम्बर आए
टूट पङे
बचे खाने के ढेर पर
ढूँढ ढूँढकर खाने लगे
हलुआ,बर्फी, लड्डू
रोटी के टुकङे
दोनों बच्चों की
अंतङियों में
नहीं था माँस का टुकङा
बाल रुखे सूखे
होठों पर पपङी सी जमी हुई
बिना नहाए महिनों से
तन पर नाम का लीर
देखा तो मन में एक टीस उठी
क्यों इन्हें
सुख की छाँव नहीं
क्यों घर में इनके लिए
कोई जगह नहीं
पूछ बैठा
अधीर होकर
तुम्हारा घर नहीं?
उत्तर नदारद
तुम्हारे माँ-बाप नहीं?
शून्य में तकती आँखें
जवाब मिल गया
मुझे शादी वालों में समझकर
बोले वे दोनों
साहब जी
हमें वहाँ अन्दर
क्यूँ नहीं जाने देते
वहाँ तो सबको
खाना मिलता है ना
क्या जवाब देता मैं उनको
हमारी सोच पर
सोचता रह गया मैं
जेब से दस का नोट निकाला
और दिया उनको
और चल पङा
गरीब अमीरों के शादी में
इतना पैसा खर्च किया
इतने पकवान बनाए
मेहमानों के लिए
क्या थोङा सा भोजन
उन बच्चों को
देने से
कम पङ जाता?

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