अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

हे भारत के कर्णधारों!

हे भारत के कर्णधारों!
हे भारत के भाग्यविधाताओं!
तुम अब जाग जाओ
इस देश का नवनिर्माण करो।

बहा दो अपना श्वेद लहू
देश का नवनिर्माण करने को
इस देश की उजाङ धरा को
बना दो तुम शस्य श्यामला।

अपनी श्वेद सरीता से
सींच दो इस प्यासी धरा को
बना दो इसको स्वर्ण-शस्य
कण-कण को अपने श्रम से।

दूर करो तुम दीनों का दुःख
करो सुखद भविष्य का निर्माण
बदल डालो देश की तस्वीर
सींच कर अपनी श्वेद सरीता से।

हे भारत के कर्णधारों!
हे देश के नौजवानों!
तुम अपना सच्चा कर्म करो
भारत का नव-निर्माण करो।

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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बसन्तागमन

जग की मनभावन ऋतु
बसन्तागमन पर,
करोङों मानस में छायी
हर्ष की लहर।

खिली कलियाँ मुस्कुराये कुसुम
महका सारा वन अँचल,
मीठी-मीठी लय-सुर-ताल में
गाने लगी कोयल चँचल।

नव प्रभात का नव अहसास
नगर-नगर गाँव-गाँव,
हरितिमा वसुन्धरा तन पर
शनैः-शनैः रखती पाँव।

चने व सरसों के पुष्पों से
खेत विहँस रहे थे,
पीत-बैंगनी वर्ण के कुसुम
सबका मन हर रहे थे।

छायी हरियाली वृक्षों पर भी
मस्ती में झूम रहे थे,
नयी-नयी कोंपलों के संग
नभ को चूम रहे थे।

बाल-गोपाल-वृद्ध-नारी
सबका मन हर्षित था,
नव-नव बसन्तागमन का
रूप बङा ही आकर्षित था।

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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