अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

सनातन धर्म की कमजोरी और जातिगत व्यवस्था

सनातन धर्म की कमजोरी और जाति व्यवस्था:
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सनातन धर्म आज अगर कमजोर है तो वो ब्राह्मणों के समयानुसार खुद को न बदलने की मानसिकता के कारण है। वे हर सदी में खुद को स्वयंभु समझते आए हैं और कालांतर में ब्राह्मणों में जातिवाद आने के कारण दूसरी जातियों से खुद को श्रेष्ठ बतलाने के लिए पुराणों सहीत कई ग्रन्थों की रचना की। ब्राह्मणों द्वारा दूसरी निम्न जातियों को प्रताङित करने से और दूसरे धर्मों में इन प्रताङित जातियों को बराबरी का दर्जा मिलने के लालच से ये पूरी की पूरी जातियां दूसरे धर्मों में चली गयी । हालांकि इस्लाम द्वारा दिखलाया गया तलवार का डर भी प्रमुख था पर ब्राह्मणों का अभिमान भी एक वजह थी।

जिस समय भारत में कोई एक सर्वमान्य भाषा नहीं थी उस समय अगर ब्राह्मण लोग सचेत होकर और संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर संस्कृत को सर्वजन के लिए सुलभ कराते तो आज भाषा के लिए किसी का मुंह नहीं ताक रहे होते। अगर सनातन धर्म सब जातियों के लिए सुलभ होता तो आज हमें इस्लाम इतना डरा नहीं रहा होता। आजकल के ब्राह्मण तो ब्राह्मण कहलाने के ही लायक नहीं रहे। शराब वे पीते हैं, मांस का सेवन वे करते हैं, परस्त्रीगमन वे करते हैं।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इस देश को और सनातन धर्म को ब्राह्मणों नें कुछ नहीं दिया। संस्कृत और हिन्दी साहित्य को इन्होंने बहुत सारा योगदान दिया है। संस्कृत के लगभग सभी ग्रन्थ ब्राह्मणों द्वारा ही लिखे हुए हैं।

इसलिए मेरा तो यही कहना यही है कि अब ब्राह्मणों को खुद को ब्रह्म का ज्ञाता कहलाने का हक छोङ देना चाहिए। आज के समय में ब्राह्मण एक जाति भर है, अन्य कुछ नहीं।
वैसे भी गीता के अनुसार मनुष्य अपने कर्मों से ब्राह्मण की पदवी पाता है, ब्राह्मण के घर जन्म लेने से नहीं।

पहले कर्म के अनुसार उच्च निम्न जातियां थी लेकिन आज इसका कहीं अस्तित्व नहीं है। पहले जो व्यक्ति चमङे का काम करता था उसका बेटा आज कलेक्टर बन जाता है और पहले जो व्यक्ति धर्म कर्म करता था उसका बेटा आज चमङे का व्यापार करता है। इसलिए हमारी नजर में आज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र एक ही हैं।

अब क्षत्रियों को ही ले लीजिए, कभी क्षत्रियों पर भू रक्षा का भार था पर कालांतर में अपनी जान और विलासिता बचाने के लिए इन्होंने मुगलों के साथ रोटी बेटी का सम्बन्ध स्थापित कर अपना धर्म नष्ट किया। किसी समय की क्षत्रिय कौम आज शराब पीकर रात को नाली किनारे पङी मिलती है। अगर इस कौम नें उस समय राणा प्रताप जैसा जीवट दिखाया होता तो क्या मजाल थी इन मुगलों की जो भारत पर राज करते…
गद्दार क्षत्रियों के ही कारण भारत में मुगल राज और बाद में अंग्रेजीराज स्थापित हो सका।

लेकिन इन बातों को आज के समय में उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि अब परिस्थितियां काफी कुछ बदल गयी हैं। आज हर कोई वैश्य बना नजर आता है, क्षत्रिय की कोई परिभाषा नहीं रह गयी है, ब्राह्मण मंदिरों तक सीमित हो गये हैं और शूद्र कहने पर कोई आंख दिखाने लगता है।
इसलिए आज के समय न तो किसी जाति को पांव की धूलि बनाया जा सकता है और न ही किसी जाति को सिर का मुकुट बनाया जा सकता है। सबको बराबर ही समझा जाना चाहिए।

@सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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