अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

शादी में अड़चन

कुछ ही साल पहले लड़कियों की कोई कमी नहीं थी जबकि भ्रूण हत्याएं आज से ज्यादा होती थी…

पहले लड़का चाहे कितना भी पढा लिखा हो या अनपढ भी हो तो भी शादी हो जाती थी पर आजकल पढे लिखों की भी शादी के लाले पड़ जाते हैं, ऐसा क्यूं…?

क्या कारण है कि आजकल लड़कों को शादी करने के लिए बहुत से पापड़ बेलने पड़ते हैं…?

पहले अगर लड़की पढी लिखी होती थी तो भी अनपढ के पल्लू बांध देते थे पर आजकल अगर लड़की अनपढ या कम पढी लिखी है तो भी उसके लिए नौकरी लगा हुआ लड़का खोजा जाता है…यानि चाहे कारण कुछ भी हो पर लड़कियों की सामाजिक स्थिति में बहुत परिवर्तन आ गया है…पर एक चीज में आज भी परिवर्तन नहीं आया है…वह चीज है ‘दहेज’….लड़कियों की सामाजिक वेल्यू बढने पर भी दहेज की बिमारी कम होने की बजाय पहले से ज्यादा बढ गयी है…जो मजबूत स्थिति वाला घर है उसके लिए दहेज की रकम और सामान देना बड़ी बात नहीं है पर बहुत से घर ऐसे हैं जिनकी आय का कोई स्थाई साधन नहीं है, उनके लिए स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है…

लड़की चाहे कितनी भी बड़ी नौकरी लगी हो, पर दहेज देना निश्चित है…और ये सब लड़का और लड़की निश्चित नहीं करते अपितु घरवाले निश्चित करते हैं…और लड़का लड़की बोल नहीं पाते इस बारे में…चाहे संकोच से या डर से या अन्य किसी भी कारण से…

पीछे एक विषय अधूरा ही छोड़ दिया शादी के विषय में…चलिए उसे भी पूरा कर लेते हैं…
अभी मेरे सामने एक दिमाग से ढीले स्क्रू वाला एक आदमी आया था…मैं ये जानकर हैरान था कि उसकी एक बीवी भी थी और दो बच्चे भी…
आजकल तो वैसे आदमी को कोई पढीलिखी क्या अनपढ लड़की भी नहीं देगा…तभी मुझे ये लेख लिखने की प्रेरणा मिली कि पहले ऐसा क्या था कि सबको बीवियां मिल जाती थी पर आजकल नहीं मिलती…

पहला कारण तो ये है कि पहले ज्यादातर गांवों में खेती ही मुख्य व्यवसाय होता था…संतानें ज्यादा होती थी..किसी को पांच किसी को दस या ज्यादा भी…और घर में बड़े बेटेखेती का काम सम्भालते थे और छोटों को पढने की जिम्मेदारी मिलती थी…पढते थे लेकिन खेती फिर भी करते थे…घर की लड़कियां ज्यादातर घर के ही कामों में हाथ बंटाती थी…स्कूल में कम ही जा पाती थी…जाती भी थी तो सरकारी स्कूल में जहां पांचवी पास करने पर भी गिनती पूरी नहीं आती थी…
और जब बच्चे ज्यादा हों तो लड़कियां भी ज्यादा ही होती थी इसीलिए भ्रूण हत्याएं की जाती थी…

चूंकि पहले मुख्य व्यवसाय खेती था तो लड़की या लड़का पढा लिखा हो या न हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था…क्योंकि काम तो खेती का ही करना था…इसलिए जहां भी रिश्तेदारी में अच्छा परिवार दिखा कि चट मंगनी पट ब्याह हो जाता था…तब लड़की या लड़के की शिक्षा देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी…बस खेती की जमीन देखने की जरूरत होती थी..खेती है तो लड़का कैसा भी हो फिट बैठ ही जाता था…क्योंकि अनपढ से अनपढ को भी खेती करना अच्छी तरह से आता था…

पर आजकल ऐसा नहीं है…
पहली बात तो ये है कि आजकल हमारे नित्य जीवन में सुविधाएं बहुत ज्यादा बढ गयी है जिनके लिए बहुत खर्च करना पड़ता है…पहले बिना बिजली के सब काम चल जाता था पर आजकल दो मिनट की लाईट कट होने पर भी हम परेशान हो जाते हैं…हमारे इस सुविधाजनक जीवन को जीने के लिए लगने वाले खर्च की पूर्ति प्रतिव्यक्ति जोत का आकार घटने के कारण खेती से होने वाली नाकाफी उपज से नहीं हो पाती है…इसलिए परिवार के सदस्यों को खेती के अलावा भी दूसरा रोजगार तलाशना पड़ता है…और सरकार की नीति के अनुरूप दो से ज्यादा बच्चे नहीं कर सकते…जब रोजगार तलाशना है तो बिना पढे तो ढंग का मिलता नहीं..इसलिए पढना जरूरी हो गया…लड़का और लड़की दोनों ही पढने लग गये…आज जहां भी देखते हैं तो यही दिखता है कि लड़कियां लड़को से ज्यादा पढी लिखी है…चूंकि लड़के परिवार को सम्भालने के लिए जल्दी ही रोजगार की तलाश करने लग जाते हैं जबकि लड़कियों के सामने ऐसी स्थिति नहीं आती है…जो लड़के नौकरी लग जाते हैं उनका तो भविष्य सरकार के हाथों सुरक्षित हो जाता है पर जो नौकरी नहीं लग पाते उनका भविष्य अनिश्चित रहता है…

लड़की के मां बाप की धारणा यही होती है कि लड़का लड़की से ज्यादा पढा हुआ होना चाहिए…जो लड़का नौकरी लग जाता है वो स्वत: लड़की ज्यादा पढा हुआ मान लिया जाता है…पर जो अनिश्चित स्वरोजगार या खेती करता हो वो लड़की से कम पढा लिखा होता है…क्योंकि आजकल सभी लड़कियां शादी होने तक और शादी के बाद भी पढती रहती है…

हां जिन लड़कों का रोजगार अच्छी कमाई वाला हो उनको लड़कियां आसानी से मिल जाती है पर जो कम पढे लिखे हों और रोजगार भी मामूली हो वो तो बेचारे मन मसोस कर रह जाएंगे…

इसलिए सभी अविवाहित लड़कों से मेरा अनुरोध है कि पढाई बीच में छोड़ने का मन ना करें….बीच में छोड़ें तो ये सूनिश्चित कर लेना कि आपके पास बढिया जॉब हो…
नहीं तो लड़कियों के लिए लम्बी लाइन लगी हुई है….

चूंकि ये सब विचार मैंने अपने नजरिये से लिखे हैं…हो सकता है किसी का नजरिया मेरे नजरिये से बिल्कुल भिन्न हों इसलिए आपके विचार भी आमंत्रित हैं…

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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झलक दिखला जा

मनसा भाई- ये आकाशवाणी का सूरतगढ केन्द्र है…
कार्यक्रम आपकी फरमाइश में आपका स्वागत है…

मनसा भाई- सबसे पहले तो आप ये बताइये कि आप कौन बोल रहे हैं और कहां से बोल रहे हैं?

मैं- सर, मैं गांव- बिरकाली (नोहर) से बोल रहा हूं…सतवीर वर्मा

मनसा भाई- कौनसा गाना सुनना चाहते हैं आप…?

मैं- सर, मैं ‘झलक दिखला जा…एक बार आजा आजा आजा’…गाना सुनना चाहता हूं…

मनसा भाई- अच्छा, बहुत सुन्दर गाना है ये हिमेश रेशमिया का गाया हुआ…
अच्छा सतवीर जी, ये गाना आप किसे डेडिकेट करना चाहेंगे…?

मैं- सर, मैं ये गाना हमारी तहसील के विधायक अभिषेक मटोरिया जी के लिए डेडिकेट करना चाहूंगा…क्योंकि जब से उनको हमने विधायक चुना है तब से गांव में उनकी झलक ही नहीं देखी हमने….शायद टूटी सड़क से आने में संकोच करते होंगे…उनसे कहिएगा कि सड़क की बजाय कच्चे रस्ते से आएंगे तो तकलीफ कम होगी…||||

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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