अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

सफर

सफर की एक बात बताऊं, हानि-लाभ इसके जताऊं।

बहुत महँगा पङता है सफर, जेब पर पङता है बुरा असर।

पैट्रोल डीजल के दाम बढे, किराया भी तेजी से चढे।

रेलमन्त्री नहीं करता सफर, पर खुन्नस निकालता किराया बढाकर।

सफर जब करो बस का, लग जाता है इसका चस्का।

आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया, बस का सफर ऐसा है भैया।

बस के सफर में दो बङी कमी, नहीं कर सकते बाथरुम और चहलकदमी।

बस के सफर में नींद की छुट्टी, आराम से हो जाती है कट्टी।

रात के सन्नाटे में उतारती है, अकेले हाईवे होटल पर रुकती है।

होटल वाला भी खूब पैसा कमाता है, मजबूरी में पाँच का बिस्किट दस में बेचता है।

चाय की प्याली हो जाती है छोटी, पाँच की एक मिलती है रोटी।

सब्जी बनी होती है सुबह की, कारण बनती है पेट में जाकर कलह की।

रात में उठकर खाना खाएँगे, नींद बेचारी को कहाँ से लाएँगे।

सङक अच्छी हो तो सफर रहता सुखद, वरना तो फिर दुखद ही दुखद।

ट्रेन का सफर अच्छा रहता, किराया भी कम है लगता।

लोकल का तो हाल बुरा रहता, पर आरक्षण से अच्छा सफर रहता।

परिचय मेलजोल बढता है, हँसी से सफर कटता है।

लोकल में सो नहीं पाते, पर आरक्षित में आराम की नींद लेते।

जितनी देर बैठना होता बैठे, फिर सीट सीधी कर लेटे।

एक फायदा भी सबसे बङा, बाथरुम भी रहता इससे जुङा।

नुकसान भी रहता यहाँ ज्यादा, हिजङे देखते यहाँ अपना फायदा।

जेबें कटती जहरखुरानी होती, भीङ में कोई अपनों को खोती।

किराया भी बढा रही सरकार, यात्रियों को है सुविधाओं की दरकार।

सुविधाएँ बढाती नहीं सरकार, जनता क्या करे लाचार?

यही है एक बस का सफर, और एक ट्रेन का सफर।

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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झर-झर झरती बूँदें झलकी

झर-झर झरती बूँदें झलकी
बरखा बरसी बूँदें बनकर
हरखा हर नर नारी मानस
फसलें झूमीं नव लय ताल संग
आया नया नवेला बसंत
लेकर खुशबू प्रसून की संग
हुआ श्रृंगार प्रकृति वृन्द का
नव पल्लव संग खिले वृक्ष
धुला गगन पाप पावन बूँदों से
झूम उठा जन कृषक मानस।
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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