अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

बिरकाली (राजस्थान) का एक परिचय

बिरकाली गाँव राजस्थान के हनुमानगढ की नोहर तहसील में स्थित है। यह नोहर से पल्लू जाने वाली सङक पर नोहर से 19 किमी. पश्चिम में स्थित है। गाँव की आबादी और क्षेत्रफल मध्यम है। न तो ये ज्यादा बङा है और न ही इसकी गिनती छोटे गाँवों में होती है। कुछ साल पहले तक बिरकाली ग्राम पंचायत में तीन गाँव शामिल थे-बिरकाली, नणाऊ और मुन्सरी। अब बिरकाली को अलग पंचायत का दर्जा मिल गया है। गाँव की आबादी लगभग 5500 है और घरों की संख्या 1000 के लगभग है।

गाँव के उत्तर में लालपुरा, उत्तर-पश्चिम में गन्धेली, पश्चिम में मुन्सरी, दक्षिण में नणाऊ, दक्षिण-पूर्व में कर्मसाना व भगवानसर, पूर्व में असरजाना गाँव स्थित है। गन्धेली को छोङकर आसपास के सब गाँवों से बिरकाली गाँव बङा है, इसलिए विकास कार्यों में इसे प्राथमिकता दी जाती है।

गाँव की स्थापना के सम्बन्ध में सुना जाता है कि सर्वप्रथम यहाँ ‘बिरका’ जाट आकर बसा था जिसके नाम पर इसका नाम ‘बिरकांवाली’ से बिगङकर ‘बिरकाली’ हो गया।
दूसरी भ्रान्ति ये भी प्रचलित है कि बीकानेर के बीका राजपूतों के वंश में उत्पन्न हुए सुल्तान सिंह बीका नें सन् 1827 में इसे बसाया था। इसी कारण इसका नाम पहले ‘बिकांवाली’ से बिगङकर वर्तमान में बिरकाली हो गया।
यहाँ पर सामन्ती युग में बीका राजपूतों और राठौङों का वर्चस्व था। गाँव में एक गढ भी है जो सिर्फ नाम का गढ है, लेकिन उसमें देखने लायक कुछ भी नहीं है। गाँव में ऊंचे टीले पर कच्ची ईंटों की बङी दीवारें निकालकर उसे लगभग 15 फिट तक मिट्टी से भरकर ऊपर साधारण मकान बनाए गये हैं। वैसे तो ये भी मजबूत कहा जा सकता है क्योंकि इस पर कोई आसानी से नहीं चढ सकता। गढ में देखने लायक एक पुरानी मारुती कार है जो ईंटों पर खङी की गई है। इसका नम्बर 0010 है।

गाँव में तीन नहरें निकलती हैं। एक पीने के पानी की है और बाकी दोनों नहरें सिंचाई की हैं। प्याऊ और सिंचाई की एक नहर तो राजस्थान नहर की शाखा है जो नियमित है और दूसरी सिंचाई की नहर जो भाखङा नहर की शाखा है, अब तक सूखी है। साल में एक दो बार ही पानी आता है इसमें। गाँव की उत्तरी सीमा ही सिंचित होता है इससे। बाकी तीनों तरफ कहीं समतल भूमि है और कहीं ऊंचे रेतीले टीले हैं। गाँव के उत्तर में एक ऊँचा टीला है जिसे स्थानीय भाषा में ‘चूळिया’ टिब्बा कहते हैं। इस पर बैठकर राजस्थानी भाषा के महान कवि चन्द्रसिंह जी ‘बिरकाळी’ अपनी कविताएँ रचते थे। ‘बादळी’ और ‘लू’ कविताएँ इसी पर बैठकर लिखी गई हैं। एक बार इटली के साहित्यकार टेस्सीटोरी चन्द्रसिंह जी से मिलने बिरकाली आए थे। तब से इस टीले का नाम ‘टेस्सीटोरी’ हो गया था।

यहाँ ज्यादातर मानसून आधारित खेती ही की जाती है। रबी के मौसम में यहाँ चना, सरसों, गेहूँ, अरण्डी, तारामीरा, सोगरा, जौ आदि फसलें बाई जाती हैं। खरीफ के मौसम में यहाँ बाजरा, ग्वार, मोठ, मूँग, नरमा, रुई, तिल आदि फसलें बोई जाती हैं। इनके साथ खेतों में काकङी, मतीरा, काचर, टिंडे के बीज डाल दिए जाते हैं जो घर में सब्जी की कमी नहीं आने देते।

गाँव में सामाजिक सद्भाव और धार्मिक समरसता देखने को मिलती है। कट्टरता किसी भी जाति या धर्म में देखने को नहीँ मिलती है। यहाँ कुम्हार, जाट, ब्राह्मण, राजपूत, बणिया, मेघवाल, बावरी, खाती, वाल्मिक, ढाढी, ढोली समाज के लोग मिलजुलकर रहते हैं। छुआछूत नाममात्र की बुजुर्गों में बाकी है। मुस्लिम समाज के लोगों को देखकर लगता ही नहीं कि ये मुसलमान है। इनके नाम और रहन-सहन भी भारतीय संस्कृति के अनुरुप है। सब एक दूसरे की जरुरत पङने पर सहयोग करते हैं।
अब पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने के कारण गाँव का रहन-सहन और मानसिकता में बदलाव आने लगा है। अब लोग रिश्तों को पैसों से तोलकर देखने लगे हैं इसलिए अब पहले जैसा गाँव नहीं रहा।

गाँव धार्मिक दृष्टि से परिपूर्ण कहा जा सकता है। गाँव में हनुमान जी, करणी माता, शिव जी, बाबा रामदेवजी, श्याम जी, राधाकृष्ण जी, गोगाजी, शीतला माता के मन्दिर हैं। यहाँ पर समय-समय पर धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते हैं।

गाँव में एक गौशाला भी है जो पिछले पाँच-छः सालों से नियमित प्रगति पर है। इसकी स्थापना 2008 में 11 कुण्डी यज्ञ द्वारा की गयी थी जिसमें देश भर के सन्तोँ नेँ अपनी आहूति दी थी। हर साल यहाँ पर सैंकङों गायों का पालन होता है। आसपास के गाँवों की बहुत सी सूनी गायें इस गौशाला में अपना पेट पालती है। गौशाला के रखरखाव का जिम्मा और चारे पानी के लिए चंदे की जिम्मेदारी गाँव वालों की है। गौशाला के लिए बीकानेर, जयपुर, हैदराबाद, कोलकाता, सूरत से भी चन्दा आता है। गौशाला की चारदीवारी के अन्दर ही हरा चारा बोया जाता है।

गाँव के बीचोँ बीच एक बङा जोहङ है जिसमें पूरे गाँव का पानी आकर इकट्ठा होता है। बरसाती पानी को इकट्ठा करने का यह एक परम्परागत साधन है। जब गाँव में नहर नहीं आयी थी तब तक गाँव के लोग पीने के लिए इसी जोहङ का पानी लेते थे। जोहङ के पानी की साफ-सफाई और आवारा पशुओं से रखवाली के लिए गाँव की तरफ से एक रखवाला नियुक्त किया जाता था। इस जोहङ के चारों तरफ पाँच-छः कुएँ भी हैं जिनका पानी पीने और पशुओं के लिए काम में लिया जाता था। ऊंटों के लाव बाँधकर इन कुओं से पानी खींचा जाता था। अब तो इनका कोई काम नहीं रह गया है।

गाँव में प्रशासनिक ईमारतें भी काफी हैं। बङा गाँव होने के कारण सरकारी योजना की सारी ईमारतें गाँव मेँ बनती हैं। यहाँ ग्राम पंचायत कार्यालय, पटवार घर, राजीव गाँधी सामुदायिक भवन आदि हैं। शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में आंगन बाङी केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, आयुर्वेदिक औषधालय, वाचनालय, रा.उ.मा.विद्यालय, रा.उ.प्रा.विद्यालय, रा.उ.प्रा.बालिका विद्यालय आदि हैं। गाँव में पांच निजि विद्यालय भी हैं जहाँ बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं।
गाँव में अन्य सुविधाओं में एम.जी.बी.ग्रामीण बैंक, मिनी बैंक और इफको सोसायटी, टेलिफोन एक्सचेंज, ई-मित्र केन्द्र, ग्राम पोस्ट ऑफिस आदि हैं।
कैसा लगा गाँव बिरकाली?

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’
09414957822

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“समाज को ऊपर उठाने के लिए क्या राजनीति और नौकरी जरुरी है?”

कुछ लोग कहते हैं कि समाज को ऊपर उठने के लिए राजनीति और आधुनिक शिक्षा बहुत जरुरी है। लेकिन मैं तो कहता हूँ कि कोई भी समाज बिना राजनीति और आधुनिक शिक्षा के भी एकता को प्रदर्शित कर सकता है और ऊंचा उठ सकता है। आधुनिक शिक्षा से चाहे वो प्रजापति समाज हो चाहे ब्राह्मण या अन्य समाज, वो जुङने की बजाए टूटता है। नौकरी करने वाला अपने परिवार के साथ बहुत कम रहना चाहता है और जब एक सरकारी नौकर को पढी लिखी पत्नी मिलती है तो उन दोनों के विचार अपने बुजुर्गों से अलग होते हैं। फलस्वरुप परिवार के टूटने का कारण बनते हैं। मैं अपने और गाँव के अन्य परिवारों के विश्लेषण के आधार पर ये बता रहा हूँ।

अगर समाज को मुख्य धारा में शामिल करना है (वैसे तो मुख्य धारा मेँ ही है। कुछ लोग कहते हैं कि समाज मुख्यधारा में नहीं है और किसी अलग ही धारा मेँ है।) तो सबसे पहले सबको शिक्षा के प्रति जागरुक करना है। शिक्षा का मतलब उच्च शिक्षा कदापि नहीं है। मेरा नजरिया भारतीय संस्कृति और नैतिकता युक्त शिक्षा है। इससे बच्चे का मनोबल बढने के साथ साथ मानसिक उन्नति संतुलित होगी। कोचिंग और होस्टल से बेहतर है कि बच्चे के लिए घर पर माँ बाप समय निकालें। इससे बच्चों को बिगङने के कम अवसर मिलेंगे। दूसरे से आगे निकलने और हर समय पढाई पर ध्यान देने के लिए टोका टोकी की जगह उसे स्वाभाविक रुप से हर काम करने दें। दसवीं के बाद उसकी पढाई की श्रेणी निश्चित करें। साइंस एकमात्र विकल्प नहीं है या नौकरी के लिए तैयारी करना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। बच्चा अगर निर्माणात्मक कार्यों में दिलचस्पी लेता है तो उस पर नौकरी के दबाव डालना अनुचित है। अगर हम कुम्भकार, प्रजापति या कुम्हार कुमावत लगाने में बङप्पन महसूस करते हैं तो हमेँ ये भी नहीं भूलना चाहिए कि हमें मेहनत वाले कार्यों में भी शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए।
नौकरी करने वाला सज्जन चिङचिङे स्वभाव और रुखे स्वभाव का होता है जो आपके मुताबिक संगठन से जुङकर अपना योगदान तो दे सकते हैं पर परिवार के साथ जुङकर मिलकर काम करने में शर्म महसूस करते हैं।

हमारे समाज के बहुत से लोग स्वदेशी इंजीनियर यानी मिस्त्री क्षेत्र में काम करते हैं। मेरे ख्याल से ये काम ना तो बुरा है और ना ही नीच काम। एक मिस्त्री (चिनाईवाला) एक दिन का 500 से 600 रुपये लेता है, इस तरह उसकी आय 15000 से 18000 रु. महीना पङती है जो उसके हर उचित सपने को पूरा करने के लिए काफी है। गाङियों के मिस्त्री का वेतन भी इसी तरह 20-22 हजार रुपये महीना पङता है जो किसी भी तरह से कम नहीं है। एक दसवीं पास लङका अगर दुकान करता है तो वो 10 से 15 हजार की आय आराम से कमा लेता है, बशर्ते वो मेहनत करे जितना एक व्यक्ति सरकारी नौकर बनने के लिए मेहनत करता है। अगर एक शिक्षार्थी दसवीं के बाद की सभी प्रकार की शिक्षा जो वो प्राप्त करता है, पर लगा खर्च जोङकर, नौकरी लगने तक नौकरी की तैयारी पर लगा खर्च जोङकर, कोचिंग या ट्यूशन खर्च जोङकर और दसवीं करने और नौकरी लगने तक क बीच में बर्बाद हुए सालों को जोङकर जितना खर्चा बैठता है अगर उतने पैसोँ से कोई धंधा किया जाए तो मेरे ख्याल से समाज में रुतबा भी बढेगा और ज्यादा नहीं तो कम से कम एक शिक्षक नहीं टीचर के बराबर तो वो पैसा कमाएगा ही।

जहाँ तक तकनीक की बात करते हैँ तो बता दूँ कि जब बिजली के बल्ब का आविष्कार हुआ था तो जो बल्ब आज दस रुपये में आता है उसी बल्ब का सबसे पहले आविष्कार हुआ था। बल्ब जैसे तकनीकी चीज की तकनीक नहीं बदली तो फिर घङे जैसी बिना तकनीक की चीज में आप तकनीक की आशा क्यों करते हैं। अगर हमारे समाज के कुछ लोग घङे बनाते हैँ तो ये बहुत अच्छी बात है। जब घङे बनाने की नई तकनीक आएगी तो वो अपने साथ बेरोजगारी भी लाएगी। जो वर्तमान में घङे बनाते हैं उनके हाथ से काम छिनकर फैक्ट्री के कर्मचारी घङे बनाएँगे। अब जहाँ इस काम को करने के लिए वो खुद के मालिक हैं वो बाद में नौकर बनकर काम करेंगे। घङे बनाने वाला हर कुम्हार अपने पास नई तकनीक नहीं ला सकता। वैसे भी मिट्टी के घङों की जगह अब प्लास्टिक या स्टील के घङे ज्यादा बिकते हैं और ये भी एक नई तकनीक है जो कम्पनियाँ संचालित करती हैं। इन घङों को बनाने में कुम्भकारों का कोई योगदान नहीं होता।

समाज के लिए नौकरी और राजनीति से ज्यादा जरुरी है कि बच्चों को सुशिक्षित किया जाए ताकि वे बङे होकर नीतिगत निर्णय लेकर अपना, अपने परिवार का और अपने समाज का नाम रोशन करे।
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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