अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

छाछ

“छाछ”
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जब से दही मथने के लिए मधानी का आविष्कार हुआ है और ये दहेज में बेटी के साथ देना अनिवार्य सा हो गया है….
तब से हमें छाछ के लिए बिजली देवी के आगे धूप बत्ती कर उसे सुबह सुबह हाजिर रहने के लिए मनाना पड़ता है…
क्योंकि आजकल ‘झेरना’ और ‘नेतरा’ घर की रसोई से गायब हो गये हैं और घर की ‘धिराणी’ अपने हाथों को कम से कम कष्ट देना चाहती है| ‘छनेड़ी’ तो आजकल कोई रोपता ही नहीं है क्योंकि चारपाई के एक पाए से काम बखूबी चल जाता है|

जब हमारे घर में मां के हाथों से चलते हुए झेरणे की खरड़-खरड़ हमारे कानों में पड़ती थी तो हमारी तुरन्त नींद टूट जाती थी और जल्दी से उठकर कुल्ला करके ‘बिलोवणे’ के पास रोटी लेकर बैठ जाते थे, इस उम्मीद में कि मक्खन हमें भी मिलेगा| और जब छाछ पर मक्खन आने के बाद माँ हमारी रोटी पर थोड़ा-थोड़ा मक्खन रख देती तो हम उसपर खांड बुरकाकर बड़े चाव से खाते थे| अब तो छाछ ही मुश्किल से मिलती है तो मक्खन का कौन ठिकाना…|

पहले ‘छनेड़ी’ बनाने के लिए पापा को बहुत मशक्कत करते हुए देखा है. पहले तो पापा कोई कैर देखते थे फिर उसके एक मजबूत सीधे तने को छनेड़ी के उपयुक्त मानकर काटते थे. पापा का मानना था कि कैर की छनेड़ी सबसे उपयुक्त रहती है क्योंकि कैर की लकड़ी में दीमक लगने का डर बहुत कम रहता है.

जब तक घर में ‘धीणा’ होता था तब तक जमकर दूध, दही, चूंटिया, घी, छाछ खाते थे और जब घर में धीणा नहीं होता था तो पड़ोस में ‘मोकळी’ छाछ मिल जाती थी. अब तो पड़ोस में क्या घर में भी छाछ बमुश्किल मिलती है. चूंटिया तो तब का खाया ही याद आता है जब हम घर पर रहते थे पर जब से घर छोड़ा है तब से चूंटिया भी छूट चुका है.

आजकल एक तो वैसे भी गाय भैंस घरों में कम ही रखते हैं और जो रखते हैं वे दूध घर पर प्रयोग करने से ज्यादा उपयुक्त डेयरी पर देने को मानते हैं. डेयरी वाले इस दूध की क्रीम निकालकर वापस हमीं को बेच देते हैं. ना घर में छाछ मिलती है और ना पड़ोस में मिलती है. जो घर में दूध रखते भी हैं वे बिजली देवी का इंतजार करते हैं कि कब देवी प्रकट हो और कब मधानी चले. और हम इंतजार करते हैं कि कब मधानी चले और हमें छाछ मिले.

आज भी आधुनिक और अत्याधुनिक पीढी को तो हाथ से दही मथना तक नहीं आता क्योंकि अब तो मधानी का समय है और दहेज में हर एक लड़की को मधानी जरूर ही मिलती है. अगर दो दिन तक भी बिजली नहीं आए तो बिलौवणे पर लगी मधानी वैसी की वैसी रखी रहेगी पर हाथ से परिश्रम कोई नहीं करेगा.

यहां महाराष्ट्र में तो कोई ‘जामण’ को भी नहीं जानते. उनसे जामण मांगने जाओगे तो उनका एक ही जवाब होगा कि हम छाछ बनाते ही नहीं. फिर होटल पर जाओ और थोड़े से जामण के लिए पाव सेर दही लाओ.
“कसम से छाछ के साथ खाना खाने का मजा ही कुछ और है.”
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– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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खुशियां

“खुशियां बांटने से ही खुशियां मिलती हैं….
छीनकर तो आपको पलभर की खुशी के बदले जीवन भर के दु:ख मिलेंगे…|”
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@ सत्य @

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