अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

बदकिस्मत कातिल Badkismat Quatil

बदकिस्मत कातिल Badkismat Katil

शुभानन्द जी द्वारा लिखित प्रस्तुत लघु उपन्यास में जिस तरह से नाम से ही पता चलता है कि यह एक ऐसे कातिल की कहानी है जिसकी किस्मत खराब होती है. वह कोई पेशेवर हत्यारा नहीं था, न ही वह कोई प्रतिशोध था पर उसने एक हत्या की लेकिन जिसके लिए वह हत्यारा बना वो भी उसका न हुआ और हड़बड़ी में एक बड़ी गड़बड़ और हुई कि उसके हाथों अपने प्रिय की हत्या हो गयी और फिर इस ग्लानि भाव को लिए हुए खुद भी खत्म हो गया….

लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट तब आता है जब एक पात्र जिंदा मिल जाता है…
तो इसे उस कातिल की बदकिस्मती ही कहेंगे कि जिसे उसने मरा समझकर खुद जान दे दी वह दरअसल जिंदा था…
इन रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए आपको यह उपन्यास पढना ही पड़ेगा.
मैं ज्यादा कुछ कहूंगा तो उपन्यास ही पूरा हो जाएगा…

कहानी में जावेद_अमर_जॉन की तिकड़ी खूब धमाल करती है. अमर का चुलबुलापन बहुत पसंद आया. शुभानन्द सर नें इस लघु उपन्यास में भी तीनों को खूब जगह दी है और कहानी भी पूरी कर दी.

मुझे तो यह लघु उपन्यास बहुत पसन्द आया. आपको कैसा लगा यह जरूर बताएं…
मेरे ब्लॉग पर भी कमेंट करें…
https://satveerkevichar.wordpress.com

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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वीर की विजय यात्रा Veer Ki Vijay Yatra

वीर की विजय यात्रा दिनेश चारण का लिखा एक एतिहासिक फिक्शन है. यह मंत्री पुत्र वीरसेन की अपने राज्य सुजानगढ के एक हिस्से पर विद्रोही कासम द्वारा कब्जाई भूमि को स्वतंत्र कराने की कहानी है. वह अपने साहस, कूटनीति व कुशल रणनीति से किस प्रकार मुस्लिम कासम के गढ में घुसकर उसको मात देता है इसका पूरा ब्यौरा जिस प्रकार से दिनेश चारण जी नें किया है उससे मुझे दिनेश जी को ऐतिहासिक उपन्यासकारों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा करने में जरा भी परेशानी नहीं होती…

इनकी लेखन शैली की बात करें तो इनका उपन्यास पढकर मुझे कुछ कुछ बाबू देवकीनन्दन खत्री जी के ऐयारी वाले उपन्यास याद आते है. फर्क इतना ही है कि दिनेश जी की कहानी में ऐयारी थोड़ी हल्के स्तर की है. इस कहानी में ऐयारों के कार्यकलाप थोड़े गूढ स्तर के और होते तो मजा आ जाता…

वैसे पूरी कहानी सीधी सादी रची गयी है. कहीं भी रहस्य या राज वाली बात या घुमावदार कहानी नहीं है. जो हर एक को सीधी तौर पर समझ में आ जाए और कहानी के साथ साथ वह आगे बढता रहे.
नसरीन का इश्क अधूरा रह गया पर कहानी में उसके रोल को पूरा इंसाफ मिला है. अंत में स्वाती के साथ न्याय हो इसलिए नसरीन का रास्ते से हटाना भी जरूरी था इसलिए कहानी के हिसाब से उसका मरना जरूरी था…

वो कहावत सही है कि अगर किसी राज्य की गुप्तचरी बहुत मजबूत है तो वह विरोधी को बिना खून खराबे के घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है. यही इस कहानी में दर्शाया गया है. कासम की गुप्तचर संस्था बहुत कमजोर थी और इसका पूरा लाभ वीरसेन नें उठाया और काठवगढ को मुस्लिमों से स्वतंत्र करा लिया.

दिनेश जी का यह प्रयास पूरी तरह से सफल रहा है मेरी नजर में. मैं आशा करता हूं कि आगे इनकी कलम से निकली इससे भी बेहतरीन रचनाएं हमें पढने को मिलेंगी…

उपन्यास :- वीर की विजय यात्रा
लेखक :- दिनेश चारण
प्रकाशक :- सूरज पॉकेट बुक्स
मूल्य :- ₹ 140

समीक्षक :- सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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