अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

कुंडली

रवि दादा के तेज से, पसीना नहीं समाय !
जो निकला मैं बाहर तो, तन ये झुलसा जाय !!

तन ये झुलसा जाय, जी ना जी में समाय !
छाया तक-तक मैं हारा, छाया कहीं ना पाय !!

नीम की छाया तको, कहे ‘बिरकाळी’ कवि !
चारपायी लगाकर सोओ, तपे कितना भी रवि !!

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

1 टिप्पणी »

भ्रमित मन

आते जाते पायल की झनक
लगती है जानी पहचानी सी
खनक होती जब चूड़ियों की
मनवा उचक डोल जाता
आशाएं पलती हिवड़े में
दर्शन को प्यासी अखियां
श्रवण तरसते कर्णद्वार
मन भागता जाता उस ओर
अंखिया लपकती पीछे
पांव उठते अपने आप
दर्शन देती परछाईयां
आंसू ढुलकाता मन
शिथिल कदमों को
वापस मोड़ देता
नीड़ की ओर…|

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

टिप्पणी करे »

%d bloggers like this: