अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

बीज बना पेड़

छिटकी है धूप उजली सी
धरती पर कहीं-कहीं
बदली भी कर रही कोशिश
धरती पर छा जाने की
विवाद चल रहा दोनों में
मैं छाऊं धरती पर सकल
पवन भी आजमाए है जोर
बदली को ले जाए कभी
बदली को ले आए कभी

धरती भुलाकर तपन को अपनी
वृक्ष बीज को शक्ति दे अपनी
बदली से जल मांगा उधार
बीज में हुआ शक्ति संचार
मां धरती हुई प्रफुल्लित
कोख से जन्मा बीज वृक्ष का
बना वह पेड़ उचित समय पर

बदली बोली सुन धरा बहना
टिकते नहीं पैर कहीं मेरे
पवन की सहचरी ठहरी
वृक्ष रहेगा सदा संग तुम्हारे
छांह रहेगी हर समय यहां पर
पथिक भी यहां लेगा आसरा
सता न पाएगा दिनकर भी अब
अपने प्रखर ताप से तुमको.

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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लगाएं वृक्ष एक अपने नाम का

तपती रेत आसमान तपता
नयन मिचाती धूप ऊजली
प्रखर दिनकर बना है बैरी
धरती ढूंढे बदली ओट को
पर बदली ना नजर आती
जा छिपी कहीं गिरी खोह में
पवन उग्र बहती शर-शर
अस्थि पंजर करे खड़-खड़
सुनकर ऊष्ण पवननाद को
जीवित जंतु नजर ना आए

पथिक दिखा ऐसी ही राह पर
पगड़ी सिर पर डंडा हाथ में
मोजड़ी पहने पैरों में अपने
लम्बी मूंछ कान तक फैली
बलियां पहने कानों में अपनी
कड़े हाथ में कांधे झोला
अधफटा कुरता धोती पहने
रंग श्यामल मटमैले वसन
हाथ की छांह आंखों पर करे
मिचमिचाती आंखें ढूंढें बदली
बदली पर ना नजर कहीं आए
दिनकर बैरी लगा योग से
पथिक की राह तपाने
हार न माने पथिक अपनी
चलता जाए कठिन डगर पर

देखा पथिक नें दूर क्षितिज पर
दृश्य कुछ हरा भरा सा
किया नमस्कार धरती मां को
राहत मिली मन को उसके
पांव उठाए चला पथिक अब
ज्यों ज्यों आया पास वृक्ष के
हुआ मलिन मुख दिनकर पवन का
छांह गहरी देख पथिक नें
किया आभार धरती मां का
बैठा सुस्ताने पथिक धरा पर
फैला दिया मां धरा नें आंचल
पवन भी अब मंद गति से
दिनकर त्याग आया पथिक संग
पाया आराम पथिक नें छांह में
पवन भी अब लगा सुस्ताने
रेगिस्तान में वृक्ष के तले

संकल्प लो तुम सभी सज्जनों
लगाएं वृक्ष एक अपने नाम का
धरती मां का आंचल रंग दें
हरे भरे वृक्ष रंग से
तपता दिनकर ना सताएगा फिर
पथिक को ना तपाएगा फिर
धरती मां भी रहेगी शीतल
पवन भी ना झुलसाएगा फिर
बदली भी फिर रहेगी ऊपर
निकलकर अपने गिरी खोह से
शीतल रहेंगे जंतु जीव तब
रहेगी हरियाली चहूंओर तब.

सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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