अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

वर्तमान में जातिपरक आरक्षण की उपयोगिता

गुजरात में आज आरक्षण के नाम पर घमासान मचा हुआ है. आर्थिक रूप से सम्पन्न जाति पटेल/पाटीदार आरक्षण की मांग पर सड़कों पर सरकारी सम्पत्ति का नुकसान कर रहे हैं. यही राजस्थान में कुछ साल पहले गुर्जरों नें किया था और कमोबेस जाटों नें भी यही किया था.

असल में सम्पन्न जातियों को आरक्षण देने की शुरूआत करना ही गलत था. अगर जाटों को आरक्षण देने की शुरुआत नहीं होती तो आज गुर्जर या पटेल आरक्षण की मांग नहीं कर रहे होते.

इधर पटेलों की एकता देखकर महाराष्ट्र में मराठा और धनगर समाज के दिमाग में कीड़ा कुलबुलाने लगा है. कांग्रेस नें भी ताल ठोंकना शुरू कर दिया है.

मुस्लिम भी कहां पीछे रहने वाले हैं. वे भी बहती गंगा में हाथ धोना चाहेंगे.

असल में आरक्षण का फार्मुला ही बेकार है. जिस समय अंबेडकर नें कुछ जातियों को आरक्षण देने क़ी वकालत करके संविधान में ये प्रावधान किया था उस समय भारतीय समाज छूआछूत जैसी गंभीर समस्याएं से ग्रसित था. उस समय अगड़ी जातियां पिछड़ी जातियों को आगे नहीं आने देना चाहती थी.

पर आज समय बदल गया है. छूआछूत लगभग खत्म हो गयी है. कहीं कहीं बची है पर जहां ये बची है वहां जागरुकता फैसल चुकी है और आज के कानून के हिसाब से छूआछूत के विरुद्ध वाद दायर किया जा सकता है.

देखने में आया है कि आरक्षण का लाभ उन जातियों को ज्यादा मिला है जो सामाजिक रूप से वर्ग विशेष में ऊंची जाति का दर्जा पा रही थी. जिन जातियों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति बहुत कमजोर थी वे अभी भी आरक्षण का समुचित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि उसी वर्ग की अगड़ी जातियां उन्हें आगे नहीं आने देती.

जैसे अनुसूचित जाति वर्ग में मेघवाल समाज सबसे ज्यादा लाभान्वित हुआ है आरक्षण से और अनुसूचित जनजाति वर्ग में मीणा जाति लाभान्वित हुई है अन्य जातियों के मुकाबले.

इसका मतलब ये है कि जाति आधारित आरक्षण से वो लक्ष्य कभी हासिल नहीं किया जा सकता जिस लक्ष्य को पाने के लिए संविधान में इसका प्रावधान किया गया था.

जाति आधारित आरक्षण का नुकसान ये हुआ कि प्रतिभाओं का पलायन विदेशों में जारी रहा और अल्प प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति देश के उच्च पदों पर बैठता रहा. अमेरिका में यही प्रतिभाएं अपने दिमाग का लोहा मनवा रही हैं जबकि भारत अभी तक आरक्षण से प्रतिभा खोज रहा है.

चिंता की बात ये है कि जिन जातियों को आरक्षण से बहुत अधिक लाभ हुआ है वे आरक्षण की मलाई न तो छोड़ने को तैयार हैं और न ही किसी और जाति के साथ बांटने के लिए तैयार हैं. इसके लिए वे लड़ने मरने के लिए भी तैयार हैं.

इधर अगड़ी व प्रतिभा और साधन सम्पन्न जातियां भी अपनी जाति के कुछ पिछड़ों का सहारा लेकर आरक्षण की मांग करने लगे हैं. जाट, पटेल, पाटीदार, ब्राह्मण, मराठा समुदाय के लोगों द्वारा इसकी मांग करना इसका उदाहरण है. इनमें ज्यादातर राजनीतिक लाभ लेने वाले नेता ही शामिल होते हैं और अगड़ी जातियों को लोक लुभावन भाषण देकर अपने साथ कर लेते हैं. चूंकि संविधान के आधार पर इन्हें आरक्षण नहीं मिल सकता लेकिन ऐसे में छुटभैया नेता अपनी जमीन तैयार कर लेते हैं. बैंसला और हार्दिक का उदाहरण सामने है.

जातिपरक आरक्षण से सिर्फ राजनीति ही की जा सकती है. इसके लिए आन्दोलन करने वाले सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहूंचाने का काम सबसे पहले करते हैं. क्योंकि उन्हें सबसे पहले यही चीज नजर आती है.

आज जरूरत है आरक्षण की परिभाषा बदलने की और इसपर गहन विचार विमर्श करने की. आरक्षण सर्व समावेशी होना चाहिए. इसमें सभी जातियों के पिछड़ों का समावेश होना चाहिए.

देश के सभी नागरिकों का डाटाबेस तैयार किया जाए. देश में जो भी चल अचल संपत्ति है उन सबको उनके मालिकों के नाम डाटा में डालकर बेनामी सम्पत्तियों को सीज किया जाए. फिर आरक्षण के लिए निर्धारित मापदंड तैयार करके लागू किया जाए. जनगणना के समय डाटबेस भी बनाया जाना चाहिए. आधार नंबर पर इसे जोड़ा जाना चाहिए ताकि एक आधार नंबर पर व्यक्ति का पूरा डाटाबेस निकल जाए. तभी आरक्षण पर राजनीति बंद होगी.

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

टिप्पणी करे »

हॉर्न प्रदूषण

क्या हम कभी इस बात पर गौर करते हैं कि हमने आज दिनभर गाड़ी पर घूमते हुए कितनी बार और कितनी देर तक अनावश्यक होर्न बजाया था….
उस होर्न से आपको दो पल का मजा मिला होगा पर दूसरों को उससे जरूर परेशानी होती है…
आजकल शहरों में ये होर्न प्रदूषण आम बात हो गयी है…लोग बात बात पर होर्न बजाते रहते हैं चाहे उसको बजाने की जरूरत हो या न हो. कुछ लोग अपने मोटरसाईकल पर बड़े बड़े भोंपू लगा लेते हैं जो अचानक बहुत तेज आवाज करते हैं. उस आवाज से कई बार कानों में देर तक पीं पीं होती रहती है. ऐसे होर्नों को अपनी गाड़ी पर लगवाने से बचना चाहिए. होर्न ऐसा होना चाहिए जिससे सामने वाले को सुनाई भी दे और कानों को परेशानी भी ना हो.
कई बार हम ट्रेफिक में फंस जाते हैं तो बहुत परेशानी होती है. कहीं पर जाने की जल्दी होती है पर ट्रेफिक निकलने नहीं देता. आजकल वैसे भी सब काम जल्दी जल्दी करने का जमाना आ गया है क्योंकि जिंदगी ही फास्ट हो गयी है. इसी जल्दबाजी में हम ये नहीं सोचते कि जब आगे जाने को जगह होगी तभी हमारे आगे वाला वाहन आगे बढेगा. पर हम इतना नहीं सोच पाते और हॉर्न पर हॉर्न बजाते रहते हैं. इससे एक तो ट्रेफिक में फंसे होने की परेशानी और ऊपर से हॉर्न से दिमाग चक्करघिन्नी बन जाता है.
इसलिए हमें ट्रेफिक में कभी भी बिना वजह हॉर्न नहीं बजाना चाहिए.
कई छिछोलों के पास नयी मोटरसाईकल होती है और दूसरों को दिखाने के लिए वे उसपर बड़ा हॉर्न फिट करवा लेते हैं. इनकी आदत होती है कि जब भी किसी पर रोब झाड़ना हो तो उसके पास जाकर अचानक से हॉर्न बजा देते हैं. इससे बेचारा अचानक हुए इस आक्रमण से हड़बड़ा जाता है जिससे कई बार उसका संतुलन भी बिगड़ जाता है फलस्वरूप दुर्घटना भी हो जाती है.
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

टिप्पणी करे »

%d bloggers like this: