अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

शिव पूजन साहित्य

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ईश्वर

यदि हमें अपनी मौजूदा जीवनशैली में कोई कमी नजर आए तो उसमें परिवर्तन करें…
पर अपनी पहचान बदलने की जरूरत नहीं है इसके लिए…
पहचान वही लोग बदलते हैं जो कायर होते हैं या कुछ अधिक पाने की लालसा रखते हैं…

हमारी पहचान हिन्दु है और हमें अपनी जीवनशैली में जो भी परिवर्तन करना है वो इस दायरे के भीतर रहकर ही करेंगे….

कुछ लोग अपनी जीवनशैली बदलने के लिए धर्म को दोष देकर पीछा छुड़ाते हैं…पर क्या आपको लगता है कि जो दूसरा धर्म आप अंगिकार करते हैं वो पूर्ण है…?
नहीं…कोई भी दूसरा धर्म अपने आप में पूर्ण नहीं है आपके स्वधर्म के अलावा….सनातन के अलावा….

प्रकृति ही ईश्वर है…अन्य देवता भी इसी प्रकृति के ही अंश है…अग्नि वायू जल पृथ्वी आकाश इसी प्रकृति के ही अंग हैं…और इन्हीं के नाना रूपों को हम देवता मानकर पूजते हैं…तो अगर कोई ईश्वर को साकार समझकर पूजे या निराकार समझकर पूजे…इससे फर्क नहीं पड़ता…

प्रकृति का कर्म है जीव की रचना करना….इसके बाद प्रकृति ये नहीं देखती कि जीव क्या करता है….एक जीव अपने जीवनकाल में जो भी कुछ करता है उसका उत्तरदायी प्रकृति ना होकर जीव ही होता है क्योंकि प्रकृति नें तो जीव को दिमाग नामक वस्तु देकर अपना पीछा छुड़ा लिया था…अब ये जीव पर निर्भर करता है कि वो अपने दिमाग से उपलब्ध संसाधनों से और क्या रचना कर सकता है…हां अगर प्रकृति पर जीव का अतिक्रमण होता है तो प्रकृति अपना बदला जरूर लेती है…

आप भगवान को न मानना चाहें तो मत मानिये…राम या कृष्ण को भी न मानना चाहें तो मत मानिए…
पर आपको इनकी बुराई करने का अधिकार किसने दिया…जबकि आप ये जानते तक नहीं हैं कि राम कृष्ण कौन थे…ये अच्छे थे या बुरे थे….आप उनके समय में नहीं हो…हो सकता है ये भगवान न होकर आम इंसान हों…पर इन्होंने अच्छे कर्म किए हो सकते हैं इसलिए इनके ऊपर ग्रन्थ लिखे हो सकते हैं…

आप कहते हो कि भगवान का अस्तित्व नहीं है…पर मैं कहता हूं कि उसका अस्तित्व है…
हो सकता है उसका कोई साकार रूप ना हो…पर निराकार रूप हो सकता है…
हो सकता है पुराणों में वर्णित भगवान का अस्तित्व ना हो पर हमें मौके बेमौके सचेत करने वाला भगवान ही है…छठी इंद्री सीधे भगवान से ही जुड़ी है…

इसलिए ईश्वर के बारे में विरोध करने से पहले आप ये स्मरण रखें कि आप किसी अज्ञात के प्रति बुरा भला कहकर अपनी ऊर्जा व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं…अपनी ऊर्जा को सकारात्मक कामों लगाएं…जब तक आपको आध्यात्मिक रहस्यों का सार मालूम ना हो तो आप उंगली उठाकर अपनी हीन मानसिकता का परिचय ना दें…इसके बजाय आप तटस्थ रह सकते हैं या ईश्वर के बारे में ज्यादा खोज कर सकते हैं….तब आप कुछ अच्छी तरह से कहने में अपने आप को समर्थ पाएंगे…

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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