अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

भंगी

मुझे लगता है इस कहनी में हमारी आजाद लेकिन अब भी गुलाम मानसिकता का पूरा परिचय मिलता है. आजादी मिली तो है पर हम आजादी का अर्थ अभी भी पूरी तरह से नहीं जान पाए हैं. हम आजादी का दिन मनाने के नाम पर देशभक्ति के कुछ तराने गा लेते हैं और आजादी के दीवानों पर कुछ रटी रटाई लाइन बोलकर इतीश्री कर लेते हैं. लेकिन दूसरे ही दिन हम फिर से देश को गर्त में धकेलने का पूरा प्रयास करने लग जाते हैं. हर दिन आजादी का होगा तभी अंग्रेजों से मिली आजादी सार्थक होगी अन्यथा हम आजाद होकर भी हमेशा गुलाम ही रहेंगे. पहले गौरों के गुलाम थे और कालों के गुलाम हैं. बदला कुछ नहीं है बस राज करने वालों के चेहरे बदल गये हैं…|
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

nidarkalam

आज शहर में काफी चहल-पहल दिखाई दे रही थी..साफ़-सफाई पुरे ज़ोरों पर की गयी थी..मानो किसी VVIP का दौरा हो.. प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने विधानसभा क्षेत्र में कल आज़ादी के मौके पर दशहेरा मैदान में भाषण देंगे और रात्रि विश्राम भी मंत्री जी शहर में ही करेंगे…मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला स्वतंत्रता समारोह का भाषण था.. मंत्री जी का पूरा दिन शहर व् उसके आस-पास ही निकलना था इसलिए तैयारियां अपने चर्म पर है…लोगों की बातचीत को “भंगी” काफी गौर से सुन रहा था..

भंगी..हाँ यही नाम दिया था सुंदरनगर के लोगों ने एक 45-50 साल के व्यक्ति को ,जो सनातन धर्म मंदिर की सीढियों के पास ही दिखाई देता था..कहते है किसी वक्त वो फौजी था,सीमा पार से दागे गये एक मोर्टार के छर्रों से वो बुरी तरह घायल हो गया था..सर पर भी गंभीर चोट आई थी..सेना के खर्चे से एक बड़े ऑपरेशन के बाद उसकी…

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जहरीली दारु

जब मैं रामगढ रहता था तब की बात है। उन दिनों हरियाणा निर्मित देशी शराब जो लाल रँग की और बिल्कुल पैट्रोल जैसी थी, की राजस्थान में धूम मची हुई थी। एक तो ये राजस्थान निर्मित शराब से सस्ती थी और दूसरी बात ये कि हरियाणा की सीमा लगने के कारण हर जगह ये आसानी से मिल जाती थी। उन्हीं दिनों में अपने गाँव में लम्बी छुट्टी बिताने के बाद रामगढ गया था। मेरा एक दोस्त था जिसका नाम मानसिंह था। वो उदास उदास रहता था। एक दिन जब उसको उदास देखा तो कारण पूछ ही लिया। तब उसने बताया कि पिछले दिनों मेरे दादाजी चल बसे। उनके स्वाभाविक रुप से जाने पर मुझे इतना दुःख ना हुआ होता जितना उनके जहरीली दारु के कारण जाने हुआ है।
तब उसने जो बताया उससे मेरे मन में ये कहानी लिखकर लोगों को जागरुक करने का विचार आया। मैं आप लोगों के सामने मानसिंह द्वारा बतायी गई अपने दादाजी की मृत्यु के सम्बन्ध में बात उसी की जुबानी यहाँ आप लोगों की नजर कर रहा हूँ।

रात का वक्त था। नौ बज रहे थे। पौस का महीना था। बाहर निकला तो धूजनी छूट रही थी। लेकिन जाना भी जरुरी था। काम ही ऐसा था। डॉ॰ रामकुमार का घर ऊपर के बास में था और हमारा घर निचले बास में। हमारे और उनके घर के बीच बीस मिनट का फासला था।
दादाजी रोज शाम को एक पव्वा देशी दारु पीते थे। ठेका घर से बहुत दूर पङता था इसलिए मैं दादाजी को पास में ही एक गैर-कानूनी तौर पर दूसरे राज्य की दारु बेचने वाले के पास से एक पव्वा रोज लाकर दे देता था। आज भी मैंने वही दारु लाकर दी थी। जब दादाजी नेँ दारु पी तब तो कुछ पता नहीं चला। लेकिन जब दारु पीने के बाद खाना खाना शुरु किया तब दारु नें अपना असर दिखाना शुरु कर दिया। पहले तो हमने सोचा कि ऐसे ही हुआ है और थोङी देर बाद सामान्य हो जाएँगे। लेकिन कुछ देर बाद जब दादाजी को उल्टियाँ आनी शुरु हो गयी तो मेरा माथा ठनका। उनके साथ कभी ऐसा नहीं होता था। अचानक ख्याल आया कि आजकल अखबार और टीवी पर जहरीली दारु से लोगों के मरने के बारे में बहुत सुना था, तो कहीं ये वही मामला तो नहीं!
दादाजी चिल्ला रहे थे- “अरे, मेरे पेट में पता नहीं क्या हो रहा है। पेट बहुत जोर से दर्द कर रहा है। आँखों के आगे अँधेरी सी छा रही है। अरे रामसुख, जल्दी से डॉक्टर को बुलाकर ला।”
उनके चिल्लाने पर मेरी दादी व पिताजी उनके पास दौङकर आ गये। मैं दौङा-दौङा डॉ॰ रामकुमार को बुलाने गया। वहाँ तक भागते-भागते मुझे सर्दी में भी पसीने छूट गये। गली आवारा कुत्ते मुझे देखकर भौंकने लगे। मैंने पहले तो छङी से उन कुत्तों को भगाया, फिर डॉ॰ रामकुमार जी के गेट के सामने खङे होकर गेट की साँकल बजायी। गाँवों में घर के आगे घंटी तो होती नहीं है। गेट जालीदार था। गेट के बजाने पर उनका कुत्ता जाग गया तथा मेरी तरफ दौङकर आया और जालीदार गेट के दूसरी तरफ से मुझे भौंकने लगा। लेकिन बीच में गेट होने के कारण वह मुझ तक नहीं पहूँच सकता था।
मैंने डॉक्टर साहब को आवाज दी- “डॉक्टर साहब! डॉक्टर साहब! दरवाजा खोलिए।”
कोई उत्तर नहीं आया। पौष के महीने में रात के नौ बजे तक कौन जागेगा।
मैंने दोबारा आवाज दी तो उनके घर का बल्ब जला। डॉक्टर साहब नें घर से बाहर आकर दूर से ही पूछा- “कौन है?”
“मैं हरिराम कुम्हार का पोता हूँ। आप जल्दी से मेरे साथ चलिए। मेरे दादाजी को पता नहीं क्या हो गया है।”
“अच्छा! तू वहीं ठहर, मैं अभी आता हूँ।”
इसके बाद डॉक्टर साहब नें हाथ में डॉक्टरी बैग ली और बाहर आए। उन्होंने अपने कुत्ते मोती को पुचकारकर शान्त किया और मेरे साथ चल दिये।
“वैसे तुम्हारे दादाजी को हुआ क्या है?”
“मेरे दादाजी रोज की तरह आज भी जब एक पव्वा दारु पीने के बाद जब रोटी खाने लगे तो उन्हें उल्टियाँ आनी शुरु हो गई और उनका पेट जोरों से दुखने लगा। मुझे लगता है कि दारु जहरीली थी, वरना ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।”
इतने में हम घर पहुँच गये। दादी का रो-रोकर बुरा हाल था। दादाजी का चेहरा तब तक पीला पङने लगा था। वे अपने पेट को पकङकर चीख रहे थे।
डॉक्टर साहब नें जल्दी से दादाजी का चेकअप किया और एक कागज पर कुछ लिखने लगे। वह कागज उन्होंने मेरे चचेरे भाई श्याम को दिया और मेडिकल से दवाई लाने को कहा। मुझे उन्होँने एक गाङी करने को कहा।
“इन्हें कस्बे के अस्पताल ले जाना पङेगा।” डॉक्टर साहब नें कहा।
शहर हमारे गाँव से चालीस किलोमीटर दूर पङता है। शहर जाने के लिए सरकार नें एक सङक बना रखी है जो इतनी टूटी हुई है कि पैदल चलने वाले भी ठीक से चल नहीं पाते। जहाँ शहर के लिए एक घण्टा लगना चाहिए वहाँ दो घण्टे लगते हैं। मैं दौङा-दौङा जीप वालोँ के घर गया और जीप को 1000 रु मेँ करके ले आया। वैसे तो इतनी दूर के लिए 800 रु होने चाहिए पर जब ज्यादा मजबूरी हो तो किराया भी ज्यादा लगता है।
जब तक हम घर पहुँचे डॉक्टर साहब नें मेडिकल से लाई हुई ग्लुकोज की बोतल दादाजी को चढा रहे थे। हम सब नें मिलकर दादाजी को जीप में बैठाया और शहर के लिए चल पङे।
जब हम शहर से दस किलोमीटर दूर थे तो दादाजी को अचानक जोर का दर्द उठा। उन्होंने हमसे कुछ कहना चाहा लेकिन वे कह नहीं पाये और उनका मुँह खुला का खुला ही रह गया।

जहरीली दारु नें एक और जान ले ली थी।

– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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