अंतस के उद्गार

@ शान्ति मन्त्रः- @"ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षम् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वम् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।"

दिल्ली का मेरा पहला सफरः 4

सुबह जब नींद खुली तो गाङी पंजाब में थी। बठिण्डा आने वाला था। पंजाब के खेत लहलहा रहे थे। धान की फसल पूरी जवान थी। दूर दूर तक धान की फसल दिख रही थी। गाङी सरपट भागी जा रही थी। खेतों में सरदार लोग काम कर रहे थे। मुझे पंजाब के खेतों के साथ राजस्थान के खेतोँ की तुलना करने में काफी संकोच हुआ।
खैर पंजाब की प्रकृति का आनंन लेते हुए बठिण्डा आ गया। मैं स्टेशन पर पंजाबी संस्कृति में खो गया। मुझे ये भी ख्याल नहीं रहा कि किसी सहयात्री से पूछ लूं कि आप कहाँ जाएंगे या ये ट्रेन कहाँ जा रही है। मैंने बठिण्डा में चाय बिस्किट के साथ हल्का नाश्ता लिया।
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ट्रेन बठिण्डा से रवाना हो गयी। मैं मस्त होकर अपनी सीट पर बैठा था। भीङ बिल्कुल नहीं थी। मेरे साथ दो सरदार और एक व्यक्ति और बैठे थे। सामने की सीट पर दो औरतें और एक आदमी के साथ एक बच्चा भी था। वे सब गंगानगर जा रहे थे, ये मुझे बाद में पता चला। ऊपर की दोनों बर्थ पर सामान लदा था।
मैं अपने में ही मगन था कि तभी काले कोट वाले टोपी धारक की छवी प्रकट हुई। मैंने तब तक टी.टी. भी नहीं देखा हुआ था। जब वो सबकी टिकटें चैक करने लगा तब मुझे पता चला कि टी.टी. ऐसा होता है। मैंने भी अपना टिकट हाथ में ले लिया और टी.टी. को दिखाने के लिए शान से बैठ गया। टी.टी. नें सबकी टिकट चैक करके मेरी टिकट चैक की। टिकट में गंतव्य हनुमानगढ था और गाङी का गंतव्य गंगानगर था।
टीटी नें मुझसे पूछा, “कहाँ जा रहे हो?”
मैंने बता दिया कि “हनुमानगढ जा रहा हूँ।”
“लेकिन ये टिकट तो गंगानगर की है और ट्रेन भी गंगानगर ही जा रही है।”
मैंने बताया कि “हनुमानगढ गंगानगर से आगे ही तो है। मैं गंगानगर स्टेशन पर उतरकर हनुमानगढ चला जाऊंगा।”
टीटी बोला “नहीं बेटा, हनुमानगढ जाने के लिए बठिण्डा से ट्रेन बदलनी पङती है। ये ट्रेन गंगानगर जा रही है और इस रास्ते में हनुमानगढ नहीं आता है।”
अब मेरा मुँह देखने वाला था। पहली बार ट्रेन का अकेला सफर और उस पर ये आफत। तब मुझे अहसास हुआ कि अगर चलने से पहले पूरे रास्ते का नक्शा देख लेता तो कितन अच्छा होता।
अब क्या किया जाए?
टीटी बोला “तुमने गैरकानूनी रुप से सफर किया है। इसलिए दण्ड भरो या जेल जाओ।”
मैंने लगभग रोने वाले अंदाज में कहा “लेकिन अंकल, जब मैंने टिकट खिङकी पर पूछताछ की थी तब तो उस मैडम नें ऐसा कुछ नहीं कहा था कि बठिण्डा ट्रेन बदलकर हनुमानगढ जाया जाएगा। उन्हें बताना चाहिए था ना?”
टीटी बोला “तुम्हें भी पूछना चाहिए था कि ये ट्रेन सीधी हनुमानगढ जाएगी या कहीँ बदलनी पङेगी। अब दण्ड तो भरना ही पङेगा वरना छः माह की जेल के लिए तैयार रहो।”
मैं जेल के नाम से डर गया। मेरे पूरे शैक्षणिक कैरियर का सवाल था। मैं दण्ड भरने पर राजी हो गया। मैंने कुछ रुपये खर्च के लिए ऊपर की जेब में रखे थे और बाकि के बेल्ट की जेब में। मैंने 50 रुपये निकाले और उसे दिये। पर वो नहीं माने। अंत में 100 रुपयों का चमीङ खाकर मामला शान्त हुआ।
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फिर जब गंगानगर स्टेशन पर उतरा तो रेलवे पुलीस द्वारा टिकट चैकिंग हो रही थी। मेरी टिकट देखकर वहाँ भी मुझे धर लिया गया। मैंनें बहुत समझाया कि मैंने इसका दण्ड भर दिया है, पर वो नहीं माने। लगभग 15 मिनट तक मुझे वहीं स्टेशन पर बिठाए रखा। तभी मुझे वो टीटी नजर आया जिन्होंने मेरी टिकट चैक की थी। मैंने उन्हें आवाज लगायी और छोङने के लिए प्रार्थना की। तब जाकर मेरा पिण्ड उनसे छूटा नहीं तो पता नहीं उस दिन क्या होता।
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फिर वहाँ से हनुमानगढ और नोहर के लिए ट्रेन की पूरी पूछताछ करके ट्रेन में चढा। हनुमानगढ उतरकर रोजगार कार्यालय में जाना कैंसिल कर दिया क्योंकि उस दिन दुर्भाग्य से रविवार था। वहाँ से फिर सीधा नोहर आ गया।
उस घटना के बाद जब भी मैं कहीं अनजान जगह जाता तो पहले नक्शा जरुर देख लेता था। आप भी कहीं जाने से पहले ऐसा जरुर करें।
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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दिल्ली का मेरा पहला सफरः 3

वहाँ से निकलकर मैं सीधा बस अड्डे पर गया और कुछ पल आराम से गुजारे। वहाँ एक जगह बैगों की दुकान थी, मैं वहाँ चला गया। मेरे पास अपना बैग नहीं था इसलिए मैंनें आने जाने के लिए एक छोटा बैग खरीदने की सोची। एक बैग पसन्द आया तो दाम पूछा। उसने 200 रुपये बताया। मुझे लगा कि ये बैग नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि दाम बहुत ज्यादा है। मैंने बैग न खरीदने की गरज से उसके दाम आधे से भी कम यानी 90 रुपये देने की पेशकश की। वह दुकानदार भी पूरा अङियल था। उसने भी अपने मन में सोचा हुआ था कि मुश्किल से मिले इस ग्राहक को किसी भी कीमत पर छोङना नहीं है।
उसने दाम कम करके 150 बता दिया। बैग का दाम एक साथ ही 50 रुपये कम करने पर मैं समझ गया कि अगर पहले ही झटके में 50 रुपये तोङा है तो ये बैग माथाझकाई करने के बाद 90 रुपये में भी मिल सकता है। इसलिए मैं अपने 90 रुपये पर ही टिका रहा।
अन्त में हारकर उस दुकानदार को वो बैग मुझे 90 रुपये में ही देना पङा। मैंने बैग लिया और अपनी एकतरफा जीत की खुशी में इतराता हुआ दूसरी दुकानों का निरिक्षण करने लगा।
फिर एक किताबों की रेहङी की तरफ चला। मैं कहीं भी जाता हूँ तो वहाँ से कम से कम एक या दो किताबें जरुर लेकर आता हूँ। उस समय मेरे पास रुपये भी बचत में थे। किताबों की रेहङी पर काफी देर छानबीन करने के बाद एक किताब पसन्द आयी जे.के.रॉलिंग द्वारा लिखी “हैरी पोटर और अज्काबान का कैदी”। उस समय हैरी पोटर चर्चाओं में छाया हुआ था और सामान्य ज्ञान में जे के रॉलिँग से सम्बंधित प्रश्न भी आते थे।
मैंने उस किताब के दाम पूछे। रेहङीवाले नें छपा मूल्य देखकर 250 रुपये बताया। मैंने कहा “भैया कुछ तो छूट करो। आप तो बिल्कुल छपा मूल्य ही ले रहे हैं।”
किताब वाले नें उस किताब का एक रुपया भी कम नहीं किया। खैर, किताब तो खरीदनी ही थी। सो 250 रुपये देकर किताब खरीद ली। फिर थोङी देर इधर-उधर चहलकदमी की और वापस गाँव जाने के लिए रेलवे स्टेशन जाने के लिए बस का इंतजार करने लगा।
थोङी देर इंतजार करने के बाद सीएनजी बस आ गयी। मैंने रेलवे स्टेशन जाने के लिए पूछा तो कंडक्टर बोला ‘आ जाओ’।
जब मैं नयी दिल्ली पहुँचा तो शाम के चार या पाँच का समय हो चुका था। मुझे नहीं मालूम था कि कौनसे मार्ग से जाने पर गाँव नजदीक पङेगा। रेवाङी वाले मार्ग का मुझे मालूम नहीं था। मुझे लगा कि अगर हनुमानगढ होकर जाएंगे तो गाँव नजदीक आएगा। जबकि हनुमानगढ की अपेक्षा रेवाङी मार्ग नजदीक पङता था। मैंने पूछताछ खिङकी पर हनुमानगढ की ट्रेन पूछी। ट्रेन रात के 11 बजे प्लेटफार्म नम्बर तीन से चलना बताया गया। न तो मैंने ट्रेन के बारे में पूरा पूछा और न उसने बताया कि हनुमानगढ कैसे जाना है। ट्रेन बठिण्डा होकर गंगानगर जा रही थी जबकि मुझे बठिण्डा उतरकर हनुमानगढ के लिए दूसरी ट्रेन पकङनी थी। इतना मुझे मालूम नहीं था।

मैं हनुमानगढ की टिकट लेकर निश्चिंत हो गया। रेलवे स्टेशन पर थोङा पेट भरने लायक खाना खाकर ट्रेन का इंतजार करने लगा।

रेलवे स्टेशन पर बहुत ज्यादा भीङ थी। इतनी भीङ मैं पहली बार देख रहा था। जयपुर रेलवे स्टेशन पर भी इतनी भीङ नहीं होती है। यहाँ गरीब से गरीब और अमीर से अमीर व्यक्ति को भी इंतजार करते हुए देखा जा सकता है। फैशन का जलवा रेलवे स्टेशन पर आमतौर पर देखा जा सकता है। जब तक ट्रेन नहीं आयी तब तक मैं इसी नर रेला में खोया रहा। ट्रेन 12 बजे के लगभग आयी थी। जब ट्रेन आयी तो मैं ट्रेन में धक्का मुक्की करते हुए चढ गया। ट्रेन के रुकते ही लोकल डिब्बे में सफर करने वाले लोग ट्रेन के डिब्बे की तरफ इस तरह भागते हैं जैसे अचानक बांध तोङकर पानी का रेला आया हो। मैं उन सके बीच जबरदस्ती अपनी जगह बनाते हुए भागकर अपने लिए एक सीट रोक ली। अब मुझे रात में सोने के लिए तकलीफ नहीं उठानी पङी। मुझे ट्रेन में रात में थोङी बहुत नींद आयी लेकिन ये आराम देने वाली थी।
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अगले अंक में जारी…
– सतवीर वर्मा ‘बिरकाळी’

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